उत्तराखंड में किसानों की गन्ने की फसल पककर तैयार है, लेकिन सरकार न तो अब तक गन्ने का समर्थन मूल्य तय कर पाई है और न ही किसानों को पिछले पेराई सत्र का बकाया 224 करोड़ रुपए का भुगतान हो पाया है।
दो सप्ताह में भुगतान कैसे होगा
ऐसे में मुख्यमंत्री की 15 दिन के भीतर गन्ना भुगतान की घोषणा हवाई साबित होने जा रही है। किसानों का कहना है कि रेट ही तय नहीं हुआ तो दो सप्ताह में भुगतान कैसे होगा।
उत्तराखंड में किच्छा और डोईवाला चीनी मिलों को छोड़ दें तो किसी भी मिल ने पिछले पेराई सत्र का भुगतान अब तक नहीं किया है। वर्ष 2012-13 से प्रदेश में न तो गन्ना मूल्य में बढ़ोत्तरी हुई है न ही किसानों को समय पर गन्ने की फसल का भुगतान हो पा रहा है।
इतना ही नहीं सरकार गन्ना मूल्य न बढ़ाए इसके लिए इंडियन शुगर मिल एसोसिएशन ने पेराई शुरू न का दबाव चीनी मिलों पर बनाया हुआ है। यही वजह है कि नादेही चीनी मिल को छोड़कर प्रदेश की अन्य आठ मीलों में अब तक पेराई शुरू नहीं हो पाई है।
जबकि किसानों की गन्ने की फसल पककर तैयार है और कुछ क्षेत्रों में किसान गन्ना की फसल की कटाई न हो पाने से गेहूं की बुआई नहीं कर पा रहे हैं।
किस चीनी मिल पर कितना बकाया
चीनी मिल - बकाया (लाख रुपए में)
सीतारगंज - 1298.63
बाजपुर - 1391.89
गदरपुर - 878.96
नादेही - 1199.82
लीबरहेडी - 5778.23
इकबालपुर - 5955.74
लक्सर - 3515.49
मिल बंद, भुगतान बाकी
काशीपुर चीनी मिल पर 2007-08 का 117.94 लाख और 2011-12 का 2374.36 लाख रुपए बकाया है। जबकि चीनी मिल बंद हो चुकी है। इस मिल को गन्ना देने वाले किसान अब भुगतान के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
गन्ने का रेट शासन को तय करना है। प्रदेश में मात्र दो चीनी मिलों को छोड़कर किसी भी चीनी मिल ने किसानों के पिछले बकाये का शत प्रतिशत भुगतान नहीं किया।
- डॉ. योगेंद्र पाल, उप आयुक्त गन्ना एवं चीनी
किसानों को सामान्य प्रजाति का 285 रुपए और अगेती का 295 प्रति क्विंटल रेट दो साल पहले मिलता था, लेकिन पिछले दो साल से न तो रेट बढ़ा न किसानों को बकाया भुगतान मिला। हालत यह है कि किसान बच्चों की फीस तक जमा नहीं कर पा रहे हैं।
- दरबान बोरा, उप सभापति किसान सेवा सहकारी गन्ना समिति