देश के प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी कल शपथ लेंगे। एक तरफ जहां सारा गुजरात खुश है तो वहीं जश्न दून के ‘गुजरात’ में भी है, जो बसा है खुड़बुड़ा इलाके की संकरी-सी बस्ती में।
गुजरातियों की बहुतायत के कारण बस्ती का नाम ही गुजराती बस्ती पड़ गया है। यहां तकरीबन 250-300 परिवार ऐसे हैं, जो आज भी दून में गुजरात को जिंदा रखे हैं।
कभी पानी की तकलीफ से आजिज आ गुजरात के सुरेंद्र नगर से पलायन करने वाले इन लोगों ने धंधे-पानी के लिए दून में अपना आशियाना तो बसा लिया, लेकिन बोली और दिल अभी भी गुजराती है।
मोदी से इनका पुराना नाता
खुड़बुड़ा में बिंदाल की तरफ जाने वाली सड़क की एक छोटी सी गली जहां जाकर खुलती है, यहीं से गुजराती बस्ती की सीमा शुरू होती है।
महज आठ फुट की गली के सबसे आखिर में बसे दो मंजिला मकान में रहने वाले परिवार की मुखिया 70 साल की पार्वती के 50 बरस इसी शहर में गुजरे हैं।
लेकिन नरेंद्र भाई मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं, तो चमक इनकी आंखों में भी देखी जा सकती है। आखिर उसी गुजरात के सुरेंद्र नगर में उनकी जड़े हैं, जहां से मोदी का नाता है।
सुधरेंगे देश के हर इलाके के हालात
पार्वती कहती हैं कि अगर आज जैसा विकास गुजरात में सालों पहले होता तो शायद उन्हें पलायन का दंश न झेलना पड़ता।
जीवन के 73 बसंत देख चुकीं पारो भी यही बात दोहराती हैं। तकरीबन 50 साल पहले उनका परिवार यहां आकर बस गया था।
पारो गुजरात केविकास की बातें सुनती हैं तो यहां के हालात से निराश हो जाती हैं। उनका दुख यह है कि बस्ती में जली-पानी की किल्लत रहती है, लेकिन अधिकारी यहां आकर नहीं झांकते।
उनका मानना है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश के हर इलाके के हालात सुधरेंगे। यह अलग बात है कि उन्हें राज्य और केंद्र सरकार का फर्कसमझ नहीं आता।
गुजरात की तर्ज पर हो यहां भी विकास
16 साल के सिद्धार्थ पढ़ाई छोड़ चुके हैं और इंदिरा मार्केट में कपड़ों के पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे हैं।
सिद्धार्थ के बकौल गुजरात में रोजगार की कोई कमी नहीं। देश के कई राज्यों में युवा नौकरी, रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं।
मोदी आए हैं तो हर जगह गुजरात की तरह रोजगार की बहार रहेगी। वह उत्तराखंड में भी गुजरात की तर्ज पर विकास किए जाने की बात रखते हैं।
घर जाते हैं तो लौटने का मन नहीं होता पर...
तकरीबन 40 साल के जितेंद्र बेशक जन्म के बाद से दून में हैं, लेकिन हर साल कुल देवी की पूजा के लिए सुरेंद्र नगर जरूर जाते हैं।
वहां उनका पुश्तैनी मकान टूटा-फूटा सही पर कायम है। जितेंद्र के बकौल ‘घर’ जाते हैं तो खो जाते हैं।
उनकी मानें तो ‘मोटा भाई’ यानी बड़े भाई समान मोदी की बदौलत वह इलाका अब इतना सुविधा संपन्न हो गया है कि आने का मन नहीं करता। लेकिन अब व्यवसाय की मजबूरी है।