रुद्रपुर के सिडकुल में नोटबंदी के बाद से 29वें दिन भी हालात सुधरते नहीं दिख रहे हैं। 4041 फैक्ट्रियों के करीब एक लाख (80 हजार अस्थायी, 20 हजार दिहाड़ी) श्रमिक भुखमरी की कगार पर हैं। सबसे भयावह हाल उन ठेका श्रमिकों का है, जिन्हें बड़ी कंपनियों के ठेकेदार नगद धनराशि के रूप में मेहनताना दिया करते हैं। ठेकेदार के पास पैसा होने के बाद भी कैश की कमी के कारण श्रमिकों को सिर्फ आश्वासन ही दे पा रहे हैं।
आठ नवंबर की रात को नोटबंदी के बाद से जहां कंपनियों में होने वाला प्रोडक्शन प्रभावित हुआ है, वहीं अब कंपनियों में काम करने वाले श्रमिकों की रोजी रोटी पर भी संकट गहरा गया है। बैंकों में पर्याप्त कैश उपलब्ध नहीं होने के कारण कंपनियों में श्रमिकों की सप्लाई करने वाले ठेकेदार उन्हें तनख्वाह नहीं दे पा रहे हैं।
वर्तमान में सिडकुल में रेगुलर बेस पर 50 हजार, अस्थायी 80 हजार और दिहाड़ी पर करीब 20 हजार मजदूर कार्यरत हैं। इसमें से रेगुलर बेस पर काम करने वाले आधे कर्मचारियों के खाते बैंकों में है लेकिन कैश न होने के कारण उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है जबकि अस्थायी काम करने वाले श्रमिकों के बैंकों में खाते ही नहीं है।
दिहाड़ी मजदूर साप्ताहिक मजदूरी लेकर अपना घर चलाते हैं, लेकिन अब जब ठेकेदारों को नई करेंसी नहीं मिल पा रही है तो ऐसे में वह श्रमिकों को उनके वेतन का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। बाहरी प्रदेशों से सिडकुल में काम करने आए कर्मचारियों की हालत इसलिए अधिक खराब हो गई है कि वह किराये पर रहकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं।