पहाड़ पर पलायन का अथाह दर्द मिला। घरौंदों पर लगे ताले खुलने का इंतजार करते-करते हार गए हैं। इस आह से एक सुखद गान भी निकला है। जामलाखाल के दो भाई बरसों पहले काम की तलाश में पहाड़ छोड़ गए थे।
जाना जिंदगी की मजबूरी था, लेकिन पलायन की पीड़ा उन्हें अपनी मिट्टी में वापस खींच लाई। जब उन्हें पता चला कि उनका गांव भी खाली होने की तरफ बढ़ रहा है तो वे अपने कदम वापस ले आए।
उन्होंने अपनी मिट्टी से गांव की जड़ों को सींचा। कर्मठ महिलाओं को साथ लेकर आर्गेनिक खेती शुरू की। कुछ जमीन उनके पास थी तो कुछ ग्रामीणों से बात करके ली। इससे महिलाओं को रोजगार मिला और गांव में खुशनुमा बयार बही। अजय और हरीश ने अपने गांव का भविष्य तो संवारा ही निर्जन हो चुके दूसरे गांव में भी उम्मीद की किरण जगाई है।
पौड़ी से करीब 16 किमी दूर जामलाखाल गांव की पूर्व प्रधान बबीता देवी के साथ अजय के खेतों की ओर चल दिए। गांव के छोर पर नीचे पगडंडियों से उतरकर वहां पहुंचे। 35 वर्षीय अजय पंवार ने कहा कि 2009 से हम दोनों भाई बाहर थे। मैं दुबई में टेलीकॉम कंपनी में काम करता था और हरीश कतर में जॉब करता था। कुछ साल बाद पता चला कि गांव में पलायन हो रहा है। तब हमने सोचा क्यों न यहीं आकर कुछ किया जाए।