देश की सीमाओं की रक्षा में मिग-27 ने जो भूमिका अदा की है, उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। यह दुनिया का इकलौता युद्धक विमान था, जिसने अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए गए अत्याधुनिक एफ-16 विमान को धूल चटा दी। काउंटर अटैक में मिग-27 का कोई तोड़ नहीं था। कारगिल युद्ध में मिग-27 ने तो युद्ध की तस्वीर ही पलट दी।
- लेफ्टिनेंट जनरल जीएस नेगी (पीवीएसएम, एवीएसएम, वीएसएम)
मिग-27 अपने दौर का उत्कृष्ट लड़ाकू विमानों में से एक था। देश की सीमाओं की रक्षा में मिग-27 ने जो भूमिका अदा की है, उसे वायुसेना के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा। मैं उन सौभाग्यशाली वायुसेना अधिकारियों में से एक हूं जिन्होंने मिग-27 को उड़ाया। यह वाकई मेें शानदार था। बाल्कन ने तो कारगिल युद्ध की तस्वीर ही पलट कर रख दी। मिग-27 पर सवार जांबाज पायलटों ने दुश्मन के इलाकों में दाखिल होकर ताबड़तोड़ हमले किए जिसके चलते दुश्मन सेना के पैर उखड़ गए। आज जब 34 साल की सेवाओं के बाद मिग-27 को विदाई दी जा रही है तो वायुसेना का पूर्व सर्वोच्च अधिकारी होने के नाते मुझे दुख भी हो रहा है।
- एयर मार्शल जी सेन, (पीवीएसएम, एवीएसएम, वीएम)
मुझे याद है कि मिग-27 को वायुसेना में शामिल करने के साथ ही इसमें कुछ बदलाव करके इसे लेह की जमीन पर उतारा गया था। तकनीकी विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि मिग-27 ऐसा कारनामा नहीं कर पाएगा लेकिन उसने ऐसा कर दिखाया। ‘बहादुर’ नाम से चर्चित मिग-27 को कारगिल युद्ध में उसके अतुलनीय योगदान के लिए याद रखा जाएगा। बाल्कन की विदाई पर मुझे दुख हो रहा है लेकिन जिस तरीके से आए दिन उड़ान के दौरान मिग-27 दुर्घटनाग्रस्त हो रहे थे उसे देखते हुए इसे वायुसेना के बेड़े से बाहर करने का वक्त आ गया था।
- कर्नल कुलदीप साहनी
वायुसेना के फ्रंटलाइन बैरियर मिग-27 ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना को धूल चटाकर भारतीयों को गौरवान्वित होने का मौका दिया। मैं उन वायुसेना अधिकारियों में शामिल हूं जिन्होंने मिग-27 के साथ देश को अपनी सेवाएं दीं। आज इसको विदा होते देखना मेरे लिए भावुक क्षण है। आसमान का सीना चीरते हुए मिग-27 की गर्जना अब कभी सुनाई नहीं देगी। इसका दुख हो रहा है।
- ग्रुप कैप्टन गुरदीप सिंह झीते
वायुसेना अधिकारियों की मानें तो मिग-27 ने 20 अगस्त 1970 को रूस ने पहली टेस्ट उड़ान भरी थी। पांच साल तक शोध के बाद तत्कालीन सोवियत यूनियन सरकार ने 1975 में इसे अपनी वायु सेनाओं में शामिल किया। इतना ही नहीं सोवियत संघ ने अपने देश की वायुसेना में मिग-27 को इस्तेमाल करने के साथ ही भारत, कजाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों को भी ये विमान बेचे।
कारगिल युद्ध में दुश्मनों को चटायी धूल
सोवियत यूनियन सरकार के शासनकाल में रूसी कंपनी मिकोयन मिरेविच कंपनी द्वारा निर्मित मिग-27 युद्धक विमान को भारतीय वायुसेना में साल 1985 में शामिल किया गया। वायुसेना में शामिल होने के बाद दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विमानों में से एक मिग-27 ने 34 साल देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 1999 में कारगिल युद्ध में तो इस युद्धक विमान के जरिये जांबाज पायलटोें ने दुश्मन पर ताबड़तोड़ हमले कर उनके ठिकानों को तहस-नहस कर दिया था।
भारत में ‘बहादुर’ तो रूस में उल्कोनोस नाम से रहा चर्चित
पूरी दुनिया में फ्लागर-डीजे नाम से चर्चित मिग-27 को कई नामों से जाना गया। कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना के पैर उखाड़ने में अहम भूमिका निभाने वाले मिग-27 को इसके पायलटों ने जहां ‘बहादुर’ नाम से पुकारा। वहीं रूसी वायुसेना के पायलटों ने इसकी लंबी नाक की वजह से इसे ‘उल्कोनोस’ नाम दिया। जबकि पूरी दुनिया में इसे ‘बाल्कन’ नाम से भी जाना गया। इसके टेस्ट के दौरान पायलट ने जब पहली बार उड़ान भरी तो इसके पायलट बाक्स के जरिये चारों तरफ का नजारा देखने के साथ उसने ‘बाल्कन’ नाम दिया।
मैक 1.6 पर थी 1700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार
वायुसेना अधिकारियों के मुताबिक बाल्कन 1700 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरता था। तकनीकी भाषा में कहें तो मिग-27 मैक 1.6 की गति से दुश्मन के क्षेत्र में दाखिल होकर भारी तबाही मचाता था। इसकी क्षमता चार हजार किलोग्राम हथियार ले जाने की थी। जबकि इसमें लगी 23 मिलीमीटर बैरल गन के जरिये दुश्मन पर हमला किया जा सकता था। यह सिंगल इंजन वाला सिंगल सीटर फाइटर प्लेन था।
विदाई देते समय निकाल ली जाती है जॉय स्टिक
वायुसेना के युद्धक विमानों को विदाई देते समय उनकी जॉय स्टिक निकालकर उसे सुरक्षित रख लिया जाता है। वायुसेना अधिकारियों के मुताबिक ‘जॉय स्टिक’ पायलट के ठीक सामने लगा एक उपकरण होता है, जिसके जरिये पायलट लड़ाकू विमानों को उड़ाने के साथ ही दुश्मन के इलाके में बम गिराने का काम करता है।