चांद के दीदार के साथ ही हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक का 745वां सालाना शुरू हो गया। इस दौरान मेहंदी डोरी की रस्म में हजारों जायरीनों ने शिरकत की।
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यह रस्म शुक्रवार देर शाम शुरू हुई। इसके साथ ही देश के कोने-कोने से जायरीनों का पिरान कलियर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है।
अदा की मेंहदी डोरी की रस्म
रबिउल अव्वल (इस्लामी कैलेंडर) का चांद दिखाई देने के साथ ही शुरू हुई उर्स की दूसरी रस्म मेहंदी डोरी धूमधाम के साथ अदा की गई।
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रस्म अदा करने के लिए हजारों जायरीन दरगाह साबिर पाक पहुंचे। जहां चारों धूनों के फकरो उज्जाम दरगाह के सज्जादा नशीन शाह मंसूर एजाज साबरी और नायब सज्जादा नशीन शाह मंजर एजाज साबरी अकीदतमंदों के साथ ‘अल्लाह-हू-अकबर’ हलको के साथ कलियर गांव स्थित सज्जादा नशीन के कदीम घर पहुंचे।
कव्वाली का भी आयोजन
यहां पहुंचकर तिलावते कुरआन शरीफ की गई और महफिल-ए-कव्वाली का आयोजन किया गया। इसके बाद खास किस्म की मेहंदी और डोरी लेकर अल्लाह-हू-अकबर के हलको के साथ दरगाह साबिर पाक पहुंचे।
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मजार-एक-मुबारक पर सबसे पहले सज्जादा नशीन शाह मंसूर एजाज साबरी ने मेहंदी डोरी और सदल पेश किया। इसके बाद नायब सज्जादा नशीन शाह मंजर एजाज साबरी ने अकीदमंदों को मेहंदी डोरी बांटी।
मेंहदी डोरी के लिए उमड़ी भीड़
इस अवसर पर दरगाह शरीफ में मेहंदी डोरी लेने के लिए अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए दरगाह और पुलिस प्रशासन को खासी मशक्कत करनी पड़ी।
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इस मौके पर शाह सुहेल, अली एजाज, खादिम मुनव्वर साबरी, खादिम इनाम साबिर, सफीक साबरी, गाजी मियां, राजी मियां और राजू फरीद आदि मौजूद रहे।
क्या है मेहंदी डोरी की रस्म?
फारसी शब्द उर्स का अर्थ है जश्न। साबिर पाक के परदा होने के बाद इसे जश्न के तौर पर इसलिए मनाया जाता है क्योंकि माना जाता है कि दुनिया से परदा होने के बाद उनकी मुलाकात अल्लाह के नबी से हुई थी।
जिस तरह से शादी से पूर्व हल्दी और मेहंदी लगाकर समारोह की शुरुआत होती है। ठीक इसी प्रकार रबीउल अव्वल का चांद दिखते ही उर्स का आगाज हो जाता है और इसी दिन साबिर पाक की मजार पर मेहंदी डोरी की रस्म के तौर पर संदल(चंदन) और मेहंदी पेश की जाती है। इस रस्म की शुरुआत पहले सज्जादानशीन उतबेआलम शेख अब्दुल ने 1524 में की थी। तभी इस रस्म को मनाया जाता रहा है।