स्वास्थ्य महानिदेशक डा. ताराचंद पंत ने बताया कि विभाग ने अनुबंध समाप्त होने से पहले ही तीन माह का अतिरिक्त स्टॉक मंगा लिया था। इसमें से करीब 20 दिन बीत चुके हैं। ऐसे में विभाग के पास अब केवल 70 दिन की दवाएं ही शेष रह गई हैं। इसके बाद दवाओं की आपूर्ति कैसे होगी, इसको लेकर अभी अधिकारी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं।
टेंडर प्रक्रिया में लगेगा वक्त
केंद्र सरकार के स्तर से कोई व्यवस्था न होने पर राज्य सरकार को खुद ही टेंडर कर यह दवाएं खरीदनी होंगी। इसमें तीन से चार माह का वक्त लग सकता है। वहीं, राज्य की दवा खरीद नीति के अनुसार निर्धारित टर्न ओवर और कीमतों में रियायत जैसी शर्तों के चलते फर्मों के मिलने में दिक्कत भी हो सकती है। पिछली बार हुए टेंडर में भी यह दिक्कतें पेश आई थी। इसके चलते ज्यादा समय भी लग सकता है।
जीवन रक्षक दवाओं में बुखार, इंफेक्शन, चोट, बर्न, सिर दर्द, उल्टी, गैस, रक्तचाप, मधुमेह समेत कई अन्य बीमारियों की दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा कई एंटीबायोटिक्स भी शामिल हैं। यह वह दवाएं हैं, जो सामान्य तौर पर अस्पताल में आवश्यक होती हैं। इनका प्रयोग सबसे ज्यादा होता है।
केंद्र सरकार के स्तर से अनुबंध खत्म होने से पहले हमने तीन माह की दवाएं स्टॉक कर ली थी। केंद्र सरकार के स्तर से मिलने वाले निर्देशों के अनुसार दवा ली जाएगी। जरूरत पड़ी तो हम खुद टेंडर निकालकर दवाएं खरीदेंगे।
-डा. ताराचंद पंत, स्वास्थ्य महानिदेशक