स्वास्थ्य विभाग के पास अब दवाओं का जनरल स्टॉक भी खत्म हो गया है। अस्पतालों, सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाओं का संकट पैदा हो गया है।
स्वास्थ्य महानिदेशालय में रहने वाली 30 फीसदी सामान्य स्टाक की दवाएं स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था बनाए रखने के लिए आपूर्ति की गईं। महानिदेशालय को बजट न मिलने की वजह से दवाओं का यह संकट पैदा हुआ है।
दवाओं के मद का जो बजट मिलता है, उसमें 70 फीसदी से खरीदारी स्वास्थ्य महानिदेशालय करता है और 30 फीसदी धनराशि मुख्य चिकित्साधिकारियों को दवा खरीद के लिए दी जाती है। महानिदेशालय जो दवाएं खरीदता है, उसका 30 फीसदी स्टाक सुरक्षित रखा जाता है। इसके अलावा प्रदेश में दवाओं का आपदा स्टॉक भी रहता है। लेकिन आपदा का स्टॉक दो-तीन महीने पहले ही समाप्त हो गया।
चुनाव के पहले इस मद में दवाएं खरीदने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने शासन को पांच करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन यह अभी अटका हुआ है। दवाओं की खरीद न हो पाने की वजह से अब सामान्य स्टॉक भी खत्म हो गया है। अस्पतालों, सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रूटीन में बंटने वाली दवाएं खत्म होने पर सामान्य स्टॉक से आपूर्ति की गई। अब महानिदेशालय के हाथ खाली हो गए हैं।
स्वास्थ्य केंद्रों को काम चलाने के लिए वैकल्पिक दवाओं की व्यवस्था की जा रही है। दर्दनाशक डाइक्लोफिनिक के स्थान पर पैरासीटामाल दी जा रही है। इसी तरह वैकल्पिक एंटी बायटिक दवाओं से काम चलाया जा रहा है।
दवाओं की किल्लत होने पर पिछले महीने अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश स्वास्थ्य विभाग को आदेश कर चुके हैं कि पाइप लाइन में जितने दवा खरीद के प्रस्ताव हैं, उनके टेंडर जल्दी से जल्दी पास कर दिए जाएं, लेकिन टेंडर नहीं हो पाए हैं और न ही प्रस्तावित बजट शासन ने पास किया है।