नई औषधि क्रय नीति की जटिल शर्तों ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में दवा संकट खड़ा कर दिया है। अस्पतालों में दवाओं की आपूर्ति के लिए खरीद नहीं हो पा रही है। मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से दवा खरीद के टेंडर नहीं हो पाने से यह स्थिति बनी हुई है।
ऐसे में अस्पतालों में दवाओं की कमी बनी हुई है। हालांकि विभागीय अधिकारी जल्द ही टेंडर प्रक्रिया कर दवाओं की खरीद का दावा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी सरकारी अस्पतालों में दवा की किल्लत नहीं होने का दावा कर रहे हैं।
जबकि मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से दवाओं की खरीद नहीं हो पाई है। नई औषधि क्रय नीति के अनुसार 70 फीसदी दवाओं की खरीद स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर से होनी है। 30 फीसदी दवाएं सीएमओ के स्तर से खरीदी जानी हैं।
पहले अस्पताल और जिला स्तर पर लोकल परचेज (एलपी), इएसआई, कोटेशन बेस, इमरजेंसी और रेट कांट्रेक्ट (आरसी) के जरिये दवा खरीदने का विकल्प होता था, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद केवल महानिदेशालय और मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से ही दवाओं की खरीद हो सकती है।
क्यों आ रही है दिक्कत?
नई औषधि क्रय नीति की जटिल शर्तों के चलते किसी भी मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से दवाओं व अन्य सामान की खरीद नहीं हो सकी है। टेंडर में शामिल होने के लिए राज्य की फर्मों का 20 करोड़ और राज्य से बाहर की फर्मों का 70 करोड़ से अधिक का टर्न ओवर होना अनिवार्य है।
इसके अलावा निर्माता फर्म को दवा 23 फीसदी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की शर्त का भी पालन करना होगा। इस वजह से मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय से हो रही खरीद में अभी तक किसी भी दवा निर्माता फर्म ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है। जिसके चलते प्रदेश के तमाम सरकारी अस्पतालों में दवाओं का संकट बना हुआ है।
टेंडर से पहले की औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू करके उसके अनुसार दवाओं की खरीद कर दी जाएगी।
डा. सुशील अग्रवाल, सीएमओ