मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) और दून घाटी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) के विलय की तैयारी है। इसके लिए शासन स्तर पर प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। बृहस्पतिवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाएगा। यदि कैबिनेट से प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो दोनों प्राधिकरण एक हो जाएंगे। इससे न सिर्फ विकास कार्यों को गति मिलेगी, बल्कि सरकारी खर्च को भी कम किया जा सकेगा।
उत्तर प्रदेश शासन के दौरान 1984 में एमडीडीए और 1986 में दून घाटी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) का गठन किया गया था। एमडीडीए को देहरादून और मसूरी के सुनियोजित विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई और साडा को सेलाकुई से लेकर ऋषिकेश तक के विकास का जिम्मा सौंपा गया। लेकिन, दोनों संस्थाओं के गठन के तीन दशक बाद अब इनका विलय किया जा रहा है। शहरी विकास एवं आवास विभाग के सूत्रों के मुताबिक एमडीडीए और साडा के विलय के प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। जिसे कैबिनेट में लाया जा रहा है। कैबिनेट में मंजूरी मिलने के साथ ही विलय संबंधी शासनादेश जारी कर लिया जाएगा।
विभागीय अफसरों का कहना है कि साडा में अफसरों, कर्मचारियों की कमी और संस्था का विकास में कम योगदान को देखते हुए इनका विलय किया जा रहा है। विलय के पीछे एक तर्क यह भी बताया जा रहा है कि एमडीडीए की अपनी एक सीमाएं हैं। प्रावधानों के मुताबिक एमडीडीए साडा के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
वहीं देहरादून में तेजी से हो रहे विकास के चलते एमडीडीए को जमीनों को जरूरत पड़ रही है। लेकिन, जमीनों का अधिकांश हिस्सा साडा के पास है। ऐसे में इस समस्या का निराकरण दोनों प्राधिकरणों के विलय के बाद ही संभव है।
एमडीडीए और साडा के विलय की कवायद लंबे समय से की जा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समय में भी दोनों प्राधिकरणों के विलय की योजना तैयार की गई थी लेकिन कुछ तकनीकी पेच के चलते विलय नहीं हो पाया। अब शासन ने दोबारा इसके प्रयास शुरू कर दिए हैं।