दरअसल, पुलिस ने पिछले साल मार्च से लेकर अगस्त तक रोहिंग्या मुसलमानों की पड़ताल में सत्यापन अभियान चलाया था। इस दौरान चांदचक इलाके में इस बस्ती के भी 450 लोगों का सत्यापन किया गया था।
इस सत्यापन में इन लोगों ने खुद को आसाम और पश्चिम बंगाल का रहने वाला बताया था। इनसे प्राप्त दस्तावेजों को नियमानुसार उनके गृह जनपदों को भेजा गया। पुलिस की रिपोर्ट को मानें तो बीते आठ माह में केवल तीन लोगों के जनपदों ही उत्तर आए हैं कि वे उनके यहां के मूल निवासी हैं और उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है।
जबकि, बाकी बचे 447 लोगों के जनपदों से कोई उत्तर अभी तक पुलिस को नहीं मिला है। लिहाजा इस बात की जांच जरूरी हो गई है कि ये लोग कहां के हैं और यहां क्यों आए हैं। वर्तमान में ज्यादातर लोग कबाड़ बीनने का काम करते हैं। इसी से उनका गुजारा चलता है। पुलिस के अधिकारियों की मानें तो इन्हें यहां से हटाने में काफी समस्या आ सकती है, लिहाजा इस बात की तस्दीक की जा रही है कि क्या ये वाकई संदिग्ध लोग हैं।
मेलों के लिए अनुमति, अवैध बस्ती के लिए नहीं
प्रशासन की कार्यप्रणाली भी अजीब है। चार-छह दिन चलने वाले मेलों के लिए बाकायदा अनुमति को चक्कर लगाने पड़ते हैं। जबकि, इतनी बड़ी बस्ती बिना किसी अनुमति के बस गई। अब यह बड़ी हो गई तो उजाड़ने या अन्यत्र बसाने में भी प्रशासन के ही हाथ पांव फूलने लगे हैं। कार्रवाई होने पर सियासी खींचतान से भी इंकार नहीं किया जा सकता।