उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों से हर वर्ष देश-प्रदेश की पांच विभूतियों को मानद उपाधि से नवाजा जाएगा। इसके अलावा प्रदेश के पांच प्रोफेसरों को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए भक्तदर्शन सिंह रावत पुरस्कार दिया जाएगा। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दून विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से संबंधित प्रेस वार्ता में यह जानकारी दी।
राजपुर रोड स्थित एक होटल में आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलावों से रूबरू कराया। इस दौरान उन्होंने बताया कि प्रदेश में पहली बार मानद उपाधि की परंपरा शुरू की जा रही है। इसके तहत इस साल 27 नवंबर को उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण को मानद उपाधि दी जाएगी। 28 नवंबर को कुमाऊं विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में गीतकार प्रसून जोशी को मानद उपाधि से नवाजा जाएगा।
इसके बाद 30 नवंबर को दून विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शिक्षाविद् एवं सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी और प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी को मानद उपाधि से नवाजा जाएगा। इसके अलावा हर वर्ष शिक्षा और शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर विभिन्न विवि और कॉलेजों में से पांच प्रोफेसर को भक्तदर्शन सिंह रावत पुरस्कार से नवाजा जाएगा। अब हर साल यह परंपरा चलाई जाएगी।
कौन थे डॉ. भक्तदर्शन
भक्तदर्शन सिंह रावत ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद डीएवी कॉलेज देहरादून से 12वीं की। उन्होंने विश्व भारती शांति निकेतन से कला स्नातक और वर्ष 1937 में इलाहाबाद विवि से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर किया। वर्ष 1929 में ही डॉ. भक्त दर्शन लाहौर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में स्वयंसेवक बने। वर्ष 1930 में नमक आंदोलन के दौरान वह पहली बार जेल गए। इसके बाद वह वर्ष 1941, 1942, 1944, 1947 तक कई बार जेल गए। वर्ष 1931 में शादी के अगले दिवस ही वह स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए चल दिए। वर्ष 1952 में उन्होंने लोकसभा में गढ़वाल का प्रतिनिधित्व किया और चार बार इस सीट पर जीत दर्ज की।
वर्ष 1963 से 1971 तक वह जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य रहे। केंद्रीय शिक्षामंत्री के रूप में उन्होंने केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना करवाई और केंद्रीय विद्यालय संगठन के पहले अध्यक्ष रहे। वर्ष 1971 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। डॉ. भक्त दर्शन ने कई ग्रंथ लिखे और संपादित किए। इनमें श्रीदेव सुमन स्मृति ग्रंथ, गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां, कलाविद मुकुंदी लाल बैरिस्टर, अमर सिंह रावत एवं उनके आविष्कार और स्वामी रामतीर्थ पर आलेख प्रमुख हैं। इसलिए उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया। 30 अप्रैल 1991 को देहरादून में डॉ. भक्तदर्शन का निधन हो गया।