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मकर संक्रांति 2020: 1921 में आज ही के दिन कुली बेगार प्रथा हुई थी खत्म 

Tue, 14 Jan 2020 05:24 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राजेंद्र धानक, अमर उजाला, बागेश्वर

सार

  • कुली उतार जैसी प्रथा खत्म करने में उत्तरायणी मेले की रही है अहम भूमिका  
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बागेश्वर का दृश्य - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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आज से 99 वर्ष पहले 14 जनवरी 1921 को मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत की ओर से थोपी गई कुली बेगार प्रथा का अंत कर दिया था। तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने प्रभावित होकर इसे रक्तहीन क्रांति का नाम दिया था। कुली बेगार और कुली उतार जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म करने में उत्तरायणी मेले की अहम भूमिका रही। 

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बागेश्वर में लगने वाले उत्तरायणी मेले का धार्मिक के साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है। उस दौर में राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बडे़ आंदोलन की तैयारी चल रही थी। तब पर्वतीय क्षेत्र में आवागमन के साधन नहीं होने के कारण ब्रिटिश सरकार कुली उतार और कुली बेगार जैसी अमानवीय व्यवस्था का सहारा ले रही थी।

14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी पर्व के अवसर पर कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत हुई। विभिन्न गांवों से आए लोगों की भीड़ काफी जोश में थी और देखते ही देखते यहां प्रदर्शन शुरू हो गया। सरयू और गोमती के संगम (बगड़) के मैदान से इस आंदोलन का उद्घोष हुआ। आंदोलन के शुरू होने से पहले ही तत्कालीन डीएम ने पंडित हरगोविंद पंत, लाला चिरंजीलाल और बद्री दत्त पांडे को नोटिस पकड़ाए लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
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हजारों लोगों का जुलूस सरयू बगड़ की ओर चल पड़ा। जुलूस में सबसे आगे एक व्यक्ति झंडा लेकर चल रहा था, जिसमें लिखा था कुली बेगार बंद करो। इस दौरान तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल भीड़ में मौजूद था। उसने भीड़ पर गोली चलानी चाही लेकिन पुलिस बल कम होने के कारण वह सफल नहीं रहा। 

आंदोलन के बाद पांडे को मिली भी कुमाऊं केसरी की उपाधि

आंदोलन सफल होने के बाद जनता ने बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी। इस प्रथा के विरोध में लोगों का प्रदर्शन जारी रहा। सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए। वह स्वयं बागेश्वर आए और चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना की।

इसके बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में इस आंदोलन के बारे में लिखा कि इसका प्रभाव संपूर्ण था। उन्होंने इसे रक्तहीन क्रांति बताया था। बिलौना निवासी साहित्यकार गोपाल बोरा ने बताया कि गांधी जी ने नुमाईशखेत में तुन के पेड़ तले चबूतरे से जनता को कुली बेगार प्रथा का अंत करने के लिए बधाई दी। तब सभा में 400 रुपये नकद, सोना चांदी जमा हुई थी।

बेगार प्रथा से संबंधित रजिस्टर नदी में बहाए
14 जनवरी 1921 को कुली बेगार प्रथा से पीड़ित लोगों ने सरयू नदी तट पर पहुंचकर बेगार प्रथा से संबंधित रजिस्टरों को फाड़कर नदी में प्रवाहित कर इस प्रथा का हमेशा के लिए अंत कर दिया था। गांवों के प्रधान अपने साथ कुली रजिस्टर लेकर पहुंचे थे। शंख ध्वनि और भारत माता की जयकारों के साथ इन कुली रजिस्टरों को फाड़कर संगम में प्रवाहित कर दिया।
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क्या है कुली बेगार प्रथा

कुली बेगार आन्दोलन 1921 में उत्तराखंड के बागेश्वर नगर में आम जनता द्वारा अहिंसक आन्दोलन था। आम आदमी से कुली का काम बिना पारिश्रमिक दिए कराने को कुली बेगार कहा जाता था। विभिन्न गांव के प्रधानों का यह दायित्व होता था, कि वह एक निश्चित अवधि के लिए, निश्चित संख्या में कुली वर्ग को उपलब्ध करायेगा। 

इस काम के लिए प्रधान के पास बाकायदा एक रजिस्टर भी होता था, जिसमें सभी गांववासियों के नाम लिखे होते थे और सभी को बारी-बारी यह काम करने के लिये बाध्य किया जाता था।

इस आन्दोलन का नेतृत्व बद्री दत्त पाण्डे ने किया था। आंदोलन के सफल होने के बाद उन्हें 'कुमाऊं केसरी' की उपाधि दी गयी। इस आन्दोलन का उद्देश्य कुली बेगार प्रथा बन्द कराने के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था। आंदोलन से प्रभावित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे 'रक्तहीन क्रांति' का नाम दिया। 
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