फैशन के इस दौर में जहां वक्त के साथ-साथ कपड़ा भी पल-पल ‘रंग’ बदल रहा है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने बचपन में एक बार खादी को अपनाया तो बस उसी के होकर रह गए।
इन्हें खादी की ऐसी आदत पड़ी कि तब से अब तक न सिर्फ खादी को पहना, बल्कि कुछ ने तो ओढ़ी और बिछाई भी खादी ही। ऐसे कुछ लोग हैं जिनके तन पर ही नहीं, बल्कि विचारों से भी सादगी झलकती है। खादी की इस आदत के पीछे क्या राज है, ये जानने के लिए ‘अमर उजाला’ पहुंचा ऐसे ही कुछ लोगों के पास। आइये आपको भी उनसे रूबरू कराते हैं।
1.- दीपनगर, डिफेंस कालोनी निवासी 67 वर्षीय कासिम हसन सिद्दकी ने बचपन में जब खादी पहनी तो फिर उन्हें कुछ और पसंद नहीं आया। उनकी ये खासियत है कि वह आज भी चरखा चलाते हैं और अधिकतर कपड़े अपने सूत से ही बनाते हैं। वह सिर्फ खादी पहनते ही नहीं बल्कि ओढ़ते-बिछाते भी खादी ही हैं। कासिम खादी बोर्ड में निदेशक भी रह चुके हैं। कासिम ने बताया कि उनके घर पर माता-पिता सभी खादी पहनते थे। यही नहीं वे गांधी के ही विचारों को अपनाते हैं।
2. सहस्त्रधारा रोड निवासी 80 वर्षीय रमा देवी ने शादी के बाद से ही खादी पहननी शुरू की। उनके पति का खादी के प्रति रुझान देखते हुए रमा ने सिर्फ खादी अपनाई। रमा ने बताया कि अब जैसे लड़कियों को कंप्यूटर का शौक है, तब के जमाने में चर्खे से सूत कातना पसंद था। स्कूलों में भी चर्खे से सूत कातने पर नंबर मिलते थे। घर पर नायलॉन और पॉलिस्टर के वस्त्र पहनकर काम करना मना था। यही वजह है कि धीरे-धीरे खादी की ऐसी आदत पड़ी कि अब शादी-ब्याह में भी खादी ही पहनकर जाती हूं।
3. पौड़ी विधायक सुंदरलाल मंद्रवाल ने हमेशा से खादी ही पहनी। उनका जीवन भी गांधीवादी विचारों के अनुरूप चलता है। सुंदरलाल की मां घर पर ही कपास उगाती थी। खुद ही उसका सूत कातती थी। माता-पिता ने जब बच्चों को खादी पहनाई तो उनकी आदत बन गई। सुंदर लाल के बाकी भाई-बहनों की आदत धीरे-धीरे बदल गई लेकिन वह नहीं बदले और हमेशा से खादी को अपनी आदत बना कर रखा। वे खादी के अलावा और कोई वस्त्र नहीं पहनते।
4. पूर्व जिला संरक्षण अधिकारी (जोगीवाला निवासी) रमिंद्री मंद्रवाल विधायक सुंदरलाल की बेटी हैं। अपने पिता की आदत को भले ही उनके बाकी भाई-बहनों ने न अपनाया हो लेकिन रमिंद्री इसके बेहद करीब रहीं। रमिंद्री ने बताया कि 13 साल की उम्र में जब उनकी समझ बढ़ी तो उन्होंने पिता से कहा कि मैं सिर्फ खादी का ही उपयोग करूंगी। तब से अब तक उनके पिता अपने और बेटी के लिए एक साथ कुर्ते लेकर आते हैं। रमिंद्री विचारों से भी गांधीवादी हैं।
और भी हैं खादी के फायदे
पहले की महिलाएं चूल्हे पर काम करती थीं। रेशमी और नॉयलान के वस्त्रों पर आग लगने का डर रहता था। इसलिए महिलाएं सूती कपड़े पहनती थीं। वहीं, खादी गर्मी में ठंडा और सर्दी में गर्म रहती है। खादी से त्वचा संबंधी रोगों से पूरी तरह बचाव भी होता है। ये भी कुछ वजहें थीं कि पुराने लोग खादी को ही वरीयता देते थे।