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महाराजा अग्रसेन भारी पड़ रहा दून का एक होटल

Sun, 17 Jan 2016 05:46 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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यह वक्त की बलिहारी नहीं और क्या है कि महाराजा अग्रसेन की शख्सियत पर एक होटल भारी पड़ रहा है।
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यह टिप्पणी किसी ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि देहरादून रेलवे स्टेशन से हरिद्वार या घंटाघर जाने वाली सड़क पर स्थित उस चौराहे के संदर्भ में है, जिसका नामकरण महाराजा अग्रसेन चौक जरूर कर दिया गया, मगर आज भी वह प्रिंस होटल चौक के नाम से जाना जाता है।

पहचान की यह समस्या केवल इसी एक स्थान की नहीं, बल्कि उन कई सड़कों-चौराहों की है, जिनके नामकरण महापुरुषों और हस्तियों के नाम पर  कर तो दिए गए, मगर उन्हें प्रचलन में लाने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
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महाराजा अग्रसेन चौक के संदर्भ में ही हम बात करें तो शहर में जहां भी इस चौक के बारे में विवरण हैं, पहचान बोर्डों में कहीं भी महाराजा अग्रसेन चौक नहीं लिखा। हर जगह इसे प्रिंस चौक ही लिखा गया है। कोई नहीं तो कम से कम अग्रवाल समाज को तो एक बार जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल करना चाहिए था कि भाई फिर इस नामकरण का फायदा क्या? अग्रवाल समाज से अमर उजाला का यह सवाल इसलिए कि उसने 1998 तक प्रिंस चौक के नाम से चर्चित चौराहे को महाराज अग्रसेन चौक के नामकरण के लिए लंबा संघर्ष किया।

दरअसल, देहरादून नगर पालिका और स्थानीय लोग देहरादून के मुख्य स्थानों को महापुरुषों के नाम पर रखने की मांग कर रहे थे। इस तरह का अभियान कई स्तरों पर चल रहा था। उस समय नगर पालिका के चेयरमैन विनोद चमोली बताते हैं कि अग्रवाल समाज अग्रवाल महासभा के बैनर तले इस चौक का नाम महाराजा अग्रसेन के नाम से करने की मांग कर रहा था।

यहां महाराजा अग्रसेन की मूर्ति की भी स्थापना की मांग की जा रही थी, लेकिन यहां पर पहले से अतिक्रमण था। पुलिस की मदद से अतिक्रमण को हटवाया गया। देहरादून नगर पालिका बोर्ड ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पहले से प्रचलित प्रिंस चौक का नाम बदलकर महाराजा अग्रसेन चौक रखा। सरकारी दस्तावेज में इस चौक का नाम महाराजा अग्रसेन चौक कर दिया गया। नगर पालिका के भूमि सेक्शन में यह सब दर्ज है।

अग्रवाल समाज की मांग पर तत्कालीन देहरादून नगर पालिका बोर्ड ने प्रस्ताव पारित कर इस चौक को महाराजा अग्रसेन चौक का नाम दिया था। अग्रवाल समाज ने इसके लिए न केवल संघर्ष किया बल्कि मूर्ति स्थापित करने में योगदान दिया। आज स्थापना के 17 वर्ष बाद चौक के एक किनारे पर लगी महाराजा अग्रसेन की मूर्ति खुद को सामने खड़े प्रिंस होटल के सामने जरूर बौना महसूस करती होगी।

महाराजा अग्रसेन की इस अनदेखी के लिए सरकार ही नहीं बल्कि हम भी जिम्मेदार हैं। हमें प्रिंस होटल से कोई गुरेज नहीं, हम उसके यशयस्वी और दीर्घजीवी होने की कामना करते हैं। हम अग्रवाल समाज से आह्वान करते हैं कि शहर में लगे संकेतक बोर्डों और सरकारी अभिलेखों में प्रिंस चौक हटाकर महाराजा अग्रसेन चौक अंकित होने तक दोबारा संघर्ष को तैयार हों। हम जिम्मेदार अधिकारियों से अनुरोध करते हैं कि वे अग्रवाल समाज को संघर्ष करने से रोकें। संकेतक बोर्डों और सरकारी अभिलेखों में महाराजा अग्रसेन का नाम ही तो पदस्थापित करना है।

अमर उजाला ने तय कर लिया है कि आज से जहां भी इस चौराहे का उल्लेख करेगा वहां बस एक ही नाम होगा, महाराजा अग्रसेन चौक। फिर आप क्या सोच रहे हैं, महापुरुष किसी समाज विशेष के नहीं होते, आज से आप भी बोलिए-महाराजा अग्रसेन चौक। जनता जनार्दन, आपने तो उत्तराखंड का उदय कर दिया, यहां  तो बस छोटे से प्रयास की जरूरत है।

तो ऐसे हुआ था उद्घाटन
27 सितंबर 1998 में महाराज अग्रसेन की मूर्ति व चौक का लोकार्पण किया गया था।  उससे पहले यहां पर मूर्ति की स्थापना के लिए अग्रवाल समाज व देहरादून नगर परिषद (तब नगर निगम का गठन नहीं हुआ था) ने संयुक्त प्रयास किए थे। इसका उद्घाटन अग्रोहा समाज के तत्कालीन संस्थापक रामेश्वर दास गुप्ता व तत्कालीन सासंद विजय गोयल ने किया था। कार्यक्रम में अग्रवाल महासभा के तेज प्रकाश, उमेश कुमार अग्रवाल, सोहन लाल गुप्ता, भूपेंद्र गुप्ता आदि उपस्थित थे।
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यह बेहद दुखद है कि लोग महान लोगों के नाम पर रखे इन नामों को भी प्रचलन में नहीं लाते हैं। इसके लिए सरकार या किसी संस्था को दोष देने के साथ लोगों को भी अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। अमर उजाला के इस अभियान से काफी बदलाव आ सकता है। मैं अभियान में पूरी तरह से साथ खड़ा हूं।
- विनोद चमोली, मेयर
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