देहरादून। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर समेत देश के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पायी जाने वाली महामेदा (जड़ी-बूटी) तेजी से लुप्त हो रही है। महामेदा के संरक्षण को लेकर वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। साथ ही इस जड़ी-बूटी के संरक्षण और अधिक से अधिक उत्पादन की योजना पर काम कर रहे हैं।
वन अनुसंधान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार के मुताबिक महामेदा एक प्रकार की जड़ी बूटी है। यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, लद्दाख समेत देश के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 2500 से लेकर 4000 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाती है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर समेत अन्य राज्यों के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अनाप-शनाप तरीके से निकाले जाने और संरक्षित नहीं किए जाने की वजह से दुर्लभ महामेदा खत्म होने की कगार पर है। पिछले कुछ दशकों से इसके अत्यधिक दोहन के चलते महामेदा को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने संकटग्रस्त पौधों की श्रेणी में डाल दिया है। ऐसे में महामेदा के संरक्षण को लेकर योजना बनाई गई है। योजना के तहत संबंधित क्षेत्रों के लोगों को जागरूक करने के साथ ही उत्पादन बढ़ाने पर अध्ययन किया जा रहा है।
महामेदा के उत्पादन से सुधरेगी पर्वतीय लोगों की आर्थिकी
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार का मानना है कि यदि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में महामेदा का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है तो इससे ना सिर्फ इस दुर्लभ जड़ी बूटी का संरक्षण किया जा सकता है, वरन पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों की आर्थिकी को भी मजबूत किया जा सकता है। डॉ. अशोक के मुताबिक महामेदा का च्यवनप्राश समेत कई अन्य चिकित्सकीय उत्पादों में प्रयोग होता है। इसकी बाजार में काफी मांग है। मांग को देखते हुए महामेदा के बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ संरक्षण किए जाने की जरूरत है।