23 सितंबर 1987 को तमिलनाडु के सीएमसी वेल्लूर अस्पताल परिसर में छह साल के महेश ने खून नहीं मिल पाने पर दम तोड़ दिया। पिता एमएमवी रामन ने रो-धोकर कलेजे पर पत्थर रख लिया।
इस हादसे ने 12 साल के बड़े भाई एमएम माधवन के जेहन को झकझोर दिया। उसने शपथ ली कि वह कोशिश करेंगे कि उनके भाई की तरह किसी की जान न जाए। अब तक वह 64 बार रक्तदान कर चुके हैं। रक्तदान दिवस पर उन्हें सम्मानित किया गया।
देखते-देखते भाई खत्म हो गया
माधवन बताते हैं कि तब मेरी उम्र 12 साल की थी। हम लोगों के देखते-देखते भाई खत्म हो गया। वह उस दिन भी खून देना चाहते थे, लेकिन डाक्टरों ने कहा था कि 18 साल से कम उम्र वाले का खून नहीं लेंगे। पिता भाई को दो महीने पहले खून दे चुके थे।
डाक्टरों ने उनको भी ब्लीड कराने से मना कर दिया था। तीसरा कोई शख्स मिला नहीं, जो भाई को खून दे सके। इसके बाद वह 18 साल की उम्र का इंतजार करने लगे, जिससे रक्तदान कर सकें। 18 साल पूरा होने में एक महीना कम था जब उन्होंने पहली बार ब्लड दिया।
महेश को चार साल की उम्र में हीमोफीलिया ‘डिटेक्ट’ हुआ था। पिता किसी तरह दो साल तक खून का इंतजाम करते रहे थे। माधवन ने बताया कि उन्होंने खुद तो 64 बार रक्तदान किया। अपने सौ से अधिक दोस्तों को प्रेरित करके रक्तदान करवाया।
ताकि खून के अभाव में कोई मर न जाए
माधवन को मंगलवार को स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया है। इस वक्त वह हिमालयन इंस्टीट्यूट में मैनेजर हॉस्पिटल फाइनेंस हैं।