इनमें ईश्वरन और आरटीओ कर्मचारी के घर तो लूटपाट की, लेकिन बिल्डर और एक चिकित्सक के घर डाका डालने की इनकी कोशिश नाकाम हो गई। पहाड़ गंज में इसकी छवि प्रॉपर्टी डीलर की है। वर्ष 2000 में बीएसएफ से बर्खास्त होने के बाद इसने प्रॉपर्टी के काम से खुद को जोड़ लिया था।
वर्ष 1995 में परीक्षा पास कर बीएसएफ में डिप्टी कमांडेंट बने वीरेंद्र ने देश की रक्षा की शपथ ली थी। उसकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में रही है। पांच साल की नौकरी के बाद इसकी छवि ऐसी बदरंग हुई तो उसके खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई हुई। वह कब कानून व्यवस्था का दुश्मन बन गया, इसका रिकार्ड पुलिस के पास भी नहीं है।
पुलिस भी गैंग के सदस्याें से दून के अलावा किसी दूसरे राज्य की घटना का इकबाल नहीं कर पाई है। डकैती के आरोपों को लेकर खुद वीरेंद्र की पत्नी और बेटी आरोपों को लेकर हैरत में है। एसएसपी अरुण मोहन जोशी ने इसकी पत्नी और बेटी से काफी देर तक बातचीत की।
दोनों का कहना था कि वीरेंद्र ने ऐसा कोई मौका नहीं दिया, जिससे उन पर शक किया जा सके। रात में जब भी बाहर जाते तो प्रॉपर्टी संबंधित कहानी बताकर ही निकलते थे। परिजनों ने हैदर के साथ रहने की भी पुष्टि की है। एसएसपी ने बात करने के बाद मां-बेटी को उनके रिश्तेदारों के सुपुर्द कर दिया।
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