उत्तराखंड के सुदूर गांवों तक सड़कें होती तो नमक तक के लिए लोगों को 30-40 किमी की दूरी नहीं नापनी पड़ती।
गांवों से दूर कस्बों तक जरूरी सामान लाने के लिए लोगों को दौड़ लगानी पड़ रही है। कभी पीठ पर और कभी खच्चरों से सामान ढुलान करना पड़ रहा है। ऐसे में सामान का महंगा पड़ना स्वाभाविक है।
सिस्टम सुस्त
वह भी तब जब अपने जाया समय की कीमत उसमें शामिल न की जाए। ऐसा नहीं है कि लोग सड़कों की मांग नहीं कर रहे हैं। कहीं सड़कें स्वीकृत भी हैं, लेकिन सिस्टम इस कदर सुस्त है कि सड़कें बन नहीं पा रही हैं।
जिसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है। वे तो जैसे आजादी से पहले सुविधाहीन थे, वैसे ही आज भी हैं।
काश, गांव तक बन जाती सड़क
सड़क बन जाती तो गोपेश्वर के डुमक और कलगोठ गांव के ग्रामीणों को नमक के एक पैकेट के लिए भी करीब 30 किमी की पैदल दूरी नहीं नापनी पड़ती है। ऐसे में ग्रामीण एक बार ही बाजार से अपनी पीठ पर महीनों का जरूरी सामान ले जाते हैं।
डुमक में 84 तो कलगोठ गांव में 86 परिवार निवास करते हैं। डुमक गांव के भवान सिंह और राजेंद्र सिंह का कहना है कि ग्रामीण एक-डेढ़ माह में पीपलकोटी, गोपेश्वर और जोशीमठ बाजारों में जाकर माहभर का सामान लेकर अपने घरों को जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि खच्चर से सामान ले जाने पर भाड़ा आठ सौ रुपए देना पड़ता है। दो बार डुमक गांव के ग्राम प्रधान रह चुके भवान सिंह का कहना है कि कोई बीडीसी बैठक ऐसी नहीं रही होगी जहां उन्होंने सड़क सुविधा की मांग न की हो, लेकिन सरकारी मशीनरी इस समस्या से मुंह फेरे हुए है।
जरूरत के सामान के लिए चुका रहे ज्यादा दाम
उत्तरकाशी के तीन दर्जन से अधिक गांवों के लोग रोजमर्रा की जरूरत के लिए 10 से 40 किमी दुर्गम पगडंडियां लांघने को मजबूर हैं।
इसका असर न सिर्फ क्षेत्र के विकास पर पड़ रहा है बल्कि भारी भरकम ढुलान भाडे़ से ग्रामीणों को नमक, चीनी जैसी जरूरत के सामान के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ रहे हैं। 100 किलो वजन का ढुलान 300 से 600 रुपए है।
ढुलान भाड़े का सीधा असर सामान की कीमतों पर पड़ता है। तभी तो इन गांवों में सभी वस्तुएं बाजार भाव से 5 से 30 रुपए अधिक दर पर उपलब्ध हो पाती हैं। ग्रामीण इस सड़क की मांग कर थक चुके हैं, लेकिन सरकार है कि सुनती ही नहीं।
पैदल दूरी नाते हैं इन गांवों के ग्रामीण
मोरी प्रखंड में ओसला, ढाटमीर, पवाणी एवं गंगाड़ गांव सड़क से 15 से 17 किमी पैदल दूरी पर हैं। लिवाड़ी, फिताड़ी, रेक्चा, हरिपुर एवं कांसला पहुंचने के लिए भी 18-20 किमी पैदल दूरी तय करनी पड़ती है।
दोणी भीतरी क्षेत्र में कहने को मसरी तक सड़क है, लेकिन यह अक्सर बंद रहने से इस क्षेत्र के लोग 12 से 15 किमी पैदल दूरी नापने को मजबूर हैं।
पुरोला प्रखंड के सर बडियार क्षेत्र के सर, पौंटी, लेवटाड़ी, गौल, छानिका एवं कंसलौं तथा कामरा एवं सांखाल गांव सड़क से 35 से 40 किमी दूर हैं। भटवाड़ी प्रखंड के पिलंग, जौड़ाव, सिल्ला, स्याबा तथा आपदा के दौरान असी गंगा घाटी गांवों तक पहुंचने के लिए 10 से 18 किमी पैदल चलना पड़ता है।
दूरस्थ गांवों में जरूरत के सामानों के दाम
वस्तु - बाजार भाव - गांव के दाम
चीनी - 35 रुपए किलो - 55 रुपए किलो
नमक - 15 रुपए किलो - 20 रुपए किलो
सरसों का तेल - 85 रुपए किलो - 115 रुपए किलो
रिफाइंड - 85 रुपए किलो - 115 रुपए किलो
कैरोसीन - 15 रुपए लीटर - 45 रुपए लीटर
आटा - 20 रुपए किलो - 25 रुपए किलो
हम सरकार से सड़कों की मांग करते थक चुके हैं। सड़क न होने से सबसे ज्यादा असर जरूरी वस्तुओं के दामों पर पड़ता है। ढुलान भाड़े से कीमतों में उछाल आना स्वाभाविक है। सरकार या तो सड़कों का निर्माण कराए या फिर सुदूरवर्ती गांवों में सस्ती दरों पर जरूरत के सामान की व्यवस्था कराए।
- हरबन सिंह चौहान, पूर्व सैन्य अधिकारी मोरी