पांच साल पहले कांग्रेस राज में राहुल गांधी जब परेड ग्राउंड आए थे, तब से लेकर अब तक उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक में काफी कुछ बदल गया है। 2016 में सत्ता संग्राम के बाद उत्तराखंड में कांग्रेस ने जो झेला है, उसे पार्टी ने बहुत करीब से महसूस किया है।
शनिवार को जब परेड ग्राउंड में परिवर्तन रैली में राहुल गांधी बोल रहे होंगे, तो साथ ही साथ वह ये तोलने की कोशिश भी कर रहे होंगे कि सत्ता संग्राम के बाद पार्टी संभल पाने में कितना कामयाब हो पाई है। तब के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी अब पार्टी के अध्यक्ष हैं। उनका आंकलन आने वाले दिनों में उत्तराखंड कांग्रेस के लिए नई दिशा भी तय करेगा।
2014 में राहुल गांधी ने परेड ग्राउंड में कांग्रेस की चुनावी रैली को संबोधित किया था। तब दिल्ली में भी कांग्रेस राज था और उत्तराखंड में भी। मोदी मैजिक में सब कुछ इस कदर ढह जाएगा, ये उम्मीद किसी को नहीं थी। 2014 में भाजपा को लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला। 2017 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भी भाजपा बेमिसाल प्रदर्शन कर गई।
कांग्रेस के हिस्से ऐसा शर्मसार करने वाला प्रदर्शन आया, जिसमें वह न सिर्फ 11 सीटों पर सिमट गई, बल्कि उसके उत्तराखंड में सबसे बडे़ नेता तत्कालीन सीएम हरीश रावत दो-दो सीटों से चुनाव हार गए। कांग्रेस ने उसके बाद दो वर्षों में उबरने के लिए काफी हाथ पांव मारे हैं। उसे कुछ कामयाबी मिली भी है, लेकिन पार्टी जिस स्थिति में थी, वहां तक पहुंचने से अभी दूर खड़ी है।
इन स्थितियों के बीच शनिवार को राहुल गांधी दून में जहां 2014 की अपनी रैली को याद करते हुए तमाम चीजों की समीक्षा कर रहे होंगे। वहीं उत्तराखंड कांग्रेस के नेताओं की चिंता दूसरी तरह की होगी। यह चिंता 2017 में इसी परेड ग्राउंड में बेहद शानदार रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा से जुड़ी है। उस वक्त मोदी की रैली में 80 हजार से ज्यादा लोगों के जुटने का दावा किया गया था।
परेड ग्राउंड की क्षमता 45 हजार लोगों की बताई जाती है। मोदी की तब की रैली में सड़कों और आस-पास के इलाकों में जमा लोगों को भी जोड़ा गया था। इस हिसाब से राहुल गांधी को सुनने कितने लोग आते हैं, इसका पूरा पूरा ब्यौरा कांग्रेस जुटाना चाहेगी। इस बात को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को करो या मरो का मंत्र दिया है।
राहुल गांधी की चुनावी रैली को लेकर सबसे बड़ा इम्तिहान कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का होगा। डेढ़ साल पहले ही प्रीतम सिंह के हाथ में उत्तराखंड कांग्रेस की कमान आई है। उसके बाद, थराली उपचुनाव और नगर निकाय चुनाव जैसी चुनौती प्रीतम सिंह ने झेली है, लेकिन लोकसभा चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती से अब वह दो-चार हैं।
राहुल गांधी की रैली यदि सफल रहती है तो जाहिर तौर पर लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को एक शानदार स्टार्ट मिलेगा। जिसकी उसे बहुत जरूरत दिखती है। कहने के लिए राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत, प्रदेश प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह, सह प्रभारी राजेश धर्माणी और नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश की भी राहुल की रैली से परीक्षा होनी है, लेकिन सबसे बड़ा इम्तिहान तो प्रीतम सिंह का ही माना जाएगा।