अपना मैदान और अपनी पिच
चुनावी मुकाबले के दौरान भाजपा-कांग्रेस के उम्मीदवारों की भरसक कोशिश दिखी कि प्रतिद्वंद्वी को अपने मैदान और अपनी पिच पर खेलने को मजबूर किया जाए। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश और रणनीति में प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा और केंद्रीय मुद्दों पर ही केंद्रित चुनाव था, जबकि कांग्रेस के सभी उम्मीदवार चुनाव को राज्य के सरोकारों और स्थानीय मुद्दों पर खींचकर लाने की कोशिश करते दिखे। कांग्रेस के उम्मीदवारों की ओर से उठाए गए तमाम स्थानीय मुद्दों पर भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने उम्मीदवारों की गारंटी लेकर इसे देश का चुनाव साबित करने का काम किया। कांग्रेस के पास फिलहाल न तो राज्य में बताने के लिए कुछ था और न ही केंद्र की पुरानी सरकारों का, लिहाजा भाजपा के केंद्रीय नेता जो कुछ कहकर गए स्टार प्रचारक और उम्मीदवार बस उसकी काट और उसे गलतबयानी बताने में जुटे रहे। कुछ लोकसभा सीट पर कांग्रेस के स्थानीय मुद्दों ने भाजपा की मुश्किलें भी बढ़ाईं। स्टार प्रचारकों की गारंटी के बाद भी कुछ स्थानीय मुद्दों का प्रभाव दिखेगा।
अच्छे नंबरों से पास हुआ दूर का वोटर, घरों से नहीं निकला वोट
इस चुनाव में राज्य के सर्विस वोटर की रिकार्ड भागीदारी दिखी। राज्य के करीब 93 हजार सर्विस वोट में करीब 90 हजार ने अपने मत का प्रयोग किया, जबकि घरों से वोट लाने की प्रक्रिया सिरे से परवान नहीं चढ़ी। चुनाव आयोग ने इस बार दिव्यांग और 85 साल से ऊपर के मतदाताओं के घर पहुंचकर उनके वोट पड़वाने की तैयारी की थी, लेकिन इसके नतीजे बहुत निराश करने वाले रहे। राज्य के करीब 80 हजार से अधिक दिव्यांग मतदाताओं में बमुश्किल तीन हजार लोग ही मतदान को तैयार हुए। वहीं, 85 की उम्र पार कर चुके करीब 65 हजार मतदाताओं में 9,400 लोग ही घर बैठकर मतदान करने को तैयार हुए। ऐसे में राज्य के अन्य मतदाताओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, ताकि मतदान प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य हासिल किया जा सके। साथ ही दिव्यांग और बुजुर्ग श्रेणी के शेष मतदाताओं को भी बूथ तक लाकर उनका वोट प्रतिशत भी बढ़ाने की जरूरत है।