राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं बन पाए मनुजेंद्र
लोकसभा के चुनावी इतिहास में मानवेंद्र शाह बड़ा नाम हैं। टिहरी लोकसभा सीट से मानवेंद्र शाह कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से आठ बार सांसद रहे। मानवेंद्र शाह जब तक देश की संसद में टिहरी लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते रहे, तब तक उनके पुत्र मनुजेंद्र शाह राजनीति में एक गुमनाम चेहरा थे। मानवेंद्र शाह के निधन के बाद मनुजेंद्र राजपरिवार में पिता के उत्तराधिकारी तो बन गए, लेकिन राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर उन्हें मतदाताओं ने नहीं स्वीकारा। वर्ष 2007 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने उन्हें चुनाव में उतारा लेकिन सहानुभूति की लहर के बावजूद मनुजेंद्र कांग्रेस के विजय बहुगुणा से हार गए।
पिता की तरह नहीं मिला मनीष खंडूड़ी जन समर्थन
गढ़वाल लोकसभा सीट पर पांच बार सांसद रहे पूर्व सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी के बेटे मनीष खंडूड़ी ने भी भाग्य आजमाया। लेकिन जनरल को जैसा जन समर्थन गढ़वाल से मिला, वैसा उनके बेटे को नहीं मिल पाया। खंडूड़ी के असली राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत बनें। 2019 के लोस चुनाव में जनरल के बेटे ने राजनीति में पर्दार्पण किया तो कांग्रेस के
उम्मीदवार के तौर पर। वृद्धावस्था में पहुंच चुके जनरल खंडूड़ी के लिए यह असहज करने वाली परिस्थितियां थीं। मनीष तीन लाख से अधिक वोटों से चुनाव हारे।
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वीरेंद्र के सामने मिथक तोड़ने की चुनौती
हरिद्वार लोकसभा पर कांग्रेस ने वीरेंद्र रावत को प्रत्याशी बनाया है। वीरेंद्र पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बेटे हैं। हरीश रावत ने उन्हें एक तरह से राजनीति उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। अल्मोड़ा और हरिद्वार से सांसद रहे चुके हरीश रावत के परिवार से वीरेंद्र दूसरे सदस्य हैं, जिन्हें लोस चुनाव लड़ने का अवसर मिला है। इससे पूर्व 2014 में हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत हरिद्वार सीट से भाग्य आजमा चुकी हैं। लेकिन संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। अब बेटे वीरेंद्र के सामने इस मिथक को तोड़ने की चुनौती है कि उत्तराधिकारियों के लिए दिल्ली दूर रही है।