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हां जी, वोट तो देना ही है...

Sat, 12 Apr 2014 11:44 AM IST
ओमप्रकाश तिवारी/अमर उजाला, देहरादून
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दोपहर के डेढ़ बज रहे थे। राजधानी दून के सहारनपुर रोड स्थित एक रिहायशी इलाके में आम के पेड़ के नीचे करीब 10 मजदूर बैठे थे।
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दो लोगों को छोड़ बाकी की उम्र 18 से 25 के साल के बीच थी। एक राजमिस्त्री का काम करते हैं, बाकी मजदूरी। ये लोग कालोनी में किसी का मकान बना रहे हैं।

इस समय लंच का समय था तो अमराई के नीचे दोपहर का भोजन करने के बाद बैठ गए थे। साथ ही चल रही थी चुनाव पर चर्चा। उन्हें देखकर मेरा भी मन हुआ कि इनसे चुनाव के मिजाज को समझा जाए।

- आप लोग इस बार चुनाव में वोट देंगे?
- हां, क्यों नहीं देंगे? कल ही गांव जा रहा हूं। उनमें से करीब बीस साल के एक युवा ने तपाक से जवाब दिया। बाकी के लोगों ने भी उसके हां में हां मिलाई। उनसे बातचीत में पता चला कि सभी यूपी के लखीमपुर खीरी जिले के एक गांव के रहने वाले हैं। राजमिस्त्री का काम करने वाला व्यक्ति देहरादून में पिछले पांच साल से है।
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बाकी के लोग पिछले एक साल के अंदर आए हैं। राजमिस्त्री को छोड़ कोई शादीशुदा नहीं है। राजमिस्त्री का परिवार उसके गांव में रहता है। बताया कि सभी चार छह माह में गांव जरूर जाते हैं। राजमिस्त्री की एक दिन की दिहाड़ी 550 रुपये है और हेल्पर की दिहाड़ी 350 रुपये है।

युवाओं की शादी नहीं हुई है यह जानकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। उत्तर प्रदेश के गांवों का भी समाज बदल गया है। सोच बदली तो अब बाल विवाह नहीं होते। इसके बाद मेरी जिज्ञासा उनकी शिक्षा के बारे में हुई।

- आप लोग कितने पढ़े हैं? मेरे इस सवाल के जवाब में एक ने कहा कि मैं 12वीं तक पढ़ा हूं। बाकी कोई नहीं पढ़ा है। उसके जवाब के बाद मैं फिर चौंका। लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है?

- बाकी क्यों नहीं पढ़े हैं? मेरे पूछने पर उनका जवाब था कि बस ऐसे ही। लेकिन जो 12वीं तक पढ़ा था उसने कहा कि पढ़कर क्या करते? करनी तो मजदूरी ही है। मेरे यह कहने पर कि ऐसा जरूरी तो नहीं है। पढ़ाई केवल नौकरी के लिए ही नहीं की जाती है।

एक समझदार नागरिक बनने के लिए भी तो पढ़ाई जरूरी है। इस पर उनमें से कोई नहीं बोला तो मैं 12वीं तक पढ़े युवा से पूछ बैठा कि तुम्हें तो आगे पढ़ना चाहिए था? उसने बिना पल गवाएं फिर कहा कि आगे पढ़कर क्या करता?

बहुतेरे बीए-एमए और डिप्लोमा करके मेरे गांव में घूम रहे हैं। आजकल कितना भी पढ़ लो नौकरी तो मिलती नहीं। हर जगह सिफारिश और पैसे का खेल है। जिसके पास पैसा, उसी के पास नौकरी, उसी के पास सबकुछ...। युवा एक सांस में बोल गया और मैं उसे देखते हुए उसके कथन के मर्म को समझने की कोशिश करता रहा।
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- आप लोग वोट किसे देंगे?
- अभी सोचा नहीं। गांव जाएंगे फिर तय करेंगे।

- किस आधार पर प्रत्याशी का चयन करेंगे?
- गांव में मिल बैठकर बात करेंगे। फिर तय करेंगे कि किसे वोट देना है।

- क्या आप लोग सोचते हैं कि चुनाव के बाद आपकी स्थिति में किसी तरह का कोई बदलाव आएगा?
- बदलाव क्या आना है जी। हम तो पहले भी ऐसे थे, अब भी हैं, आगे भी ऐसे ही रहेंगे?
- लेकिन वोट देंगे?
- हां जी। कल ही जा रहे हैं हम लोग गांव। वोट तो देना ही है।

उनके लंच का समय खत्म हो गया था। वह उठकर काम पर चले गए। मैं भी आगे बढ़ गया यह सोचते हुए कि तभी तो हमारे देश में लोकतंत्र जिंदा है। चुनाव के बाद जिनकी जिंदगी में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आने वाला है वह भी सैकड़ों किलोमीटर दूर होते हुए भी चुनाव के हवनकुंड में आहुति डालने जा रहा है। उनकी न कोई अपनी इच्छा है और न ही सपने। लेकिन चुनाव को उत्सव मानते हैं तो उसमें भागीदारी पूरे जोश से करते हैं...।
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