कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा का गांव लोब जिला मुख्यालय बागेश्वर से करीब 28 किलोमीटर दूर है। ऊबड़-खाबड़ रास्ते सिर्फ लोगों के लिए नहीं, सहूलियतों के लिए भी हैं।
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गांव से 200 परिवारों का पलायन हो चुका है। 257 वोटरों वाले गांव तक पहुंचने के लिए दाणोंछीना से दो किमी का रास्ता तो बेहद खराब है।
हम पहुंचे तो पाया लोब के दो हिस्से हैं मल्ला और तल्ला लोब। पहले यहां के लोग मुख्य रूप से खेती और पशुपालन करते थे। अब खेत परती है। जिन्होंने थोड़ी पढ़ाई भी की, वे गांव छोड़ गए।
सांसद टम्टा खुद नहीं जाते अपने गांव
आलम यह है कि करीब 350 परिवारों में से 200 अब गांव में नहीं रहते। कई घरों में अब केवल बुजुर्ग बचे हैं। प्रदीप टम्टा के घर पर भी ताला लगा है।
उनके चचेरे भाई विंदेश्वरी प्रसाद ने बताया कि प्रदीप पिछले दिसंबर में अपनी माता के निधन पर घर आए थे। विशेष मौकों पर यहां आते रहते हैं। लेकिन परिवार प्रदीप टम्टा का पूरा बचाव करता है। उनकी चचेरी भाभी बसंती देवी कहती हैं कि सांसद से गांव को काफी उम्मीदें हैं।
मनरेगा से मिले पैसे से जो रास्ते बनाए गए वो बिच्छू घास से ढंक चुके हैं। गांव में एएनएम सेंटर तक नहीं हैं। प्रसव पीड़ित महिलाओं को गांव से दो किलोमीटर दूर दाणोंछीना और गंभीर रोगियों को जिला अस्पताल ले जाना पड़ता है। आंगनबाड़ी भवन नहीं है। सिंचाई के लिए कोई योजना नहीं है।
रोजगार का नहीं है कोई साधन
प्राथमिक पाठशाला एकल शिक्षक के सहारे है। इसमें 16 बच्चे हैं। जूनियर की शिक्षा के लिए बच्चों को दो किमी दूर सतरगांव और इंटर के लिए पांच किमी दूर भटखोला जाना पड़ता है।
रोजगार के नाम पर कुछ लोग लोहार, बढ़ईगिरी और दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। इसके लिए वह सुबह ही दूसरे गांवों को चले जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं।
गांव के पनी राम कहते हैं कि गांव में रोजगार के साधन नहीं होने से बच्चों को दूर दराज के क्षेत्रों में जाने को मजबूर होना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव के लिए प्रदीप टम्टा ने ही सड़क मंजूर कराई है।
दो किमी दूर से ढोना पड़ता है गैस सिलेंडर
आशा देवी कहती हैं कि रसोई गैस के सिलेंडर के लिए उन्हें दाणोंछीना जाना पड़ता हैं। जो लोग घरों में अकेले रहते हैं, उन्हें एक सिलेंडर के लिए एक सौ रुपये का भाड़ा देना पड़ता है।
ग्रामीण श्याम लाल टम्टा का कहना हैं कि गांव के विकास के लिए सांसद अधिकारियों को कहते हैं, लेकिन अधिकारी- कर्मचारी सुनते नहीं। ग्रामीणों के पास खेती काफी कम है, जिसमें गेहूं, जौ, धान आदि उगाया जाता है।
विशनुली देवी कहती हैं कि गांव के लिए 1985 में विनसर से एक पेयजल योजना बनी थी। योजना के टैंक की क्षमता एक हजार लीटर की ही है, गर्मी के दिनों में नौला भी सूख जाता है, आज तक टैंक की क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारियों ने नहीं समझी।
धर्मानंद मिश्रा कहते हैं अनुसार लोब गांव में जरूरी सामग्री दाणोंछीना से खच्चरों पर लादकर लाई जाती है। ग्रामीणों ने कहा कि दाणोंछीना-लोब-पगना मार्ग दो किमी तक कट चुका है। यहां तक डामरीकरण शीघ्र होना चाहिए।
क्या कहते हैं प्रदीप टम्टा
2002 में जब मैं सोमेश्वर का विधायक था तभी लोब गांव के लिए सड़क स्वीकृत कराई थी। भाजपा सरकार ने निर्माण कार्य रोके रखा। हर गांव में एएनएम सेंटर खुलना था। भाजपा ने इस मामले में भी उपेक्षा का भाव रखा।
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केंद्र ने राज्य को विकास कार्यों के लिए बजट दिया, लेकिन भाजपा के जनप्रतिनिधियों ने मेरे गांव के साथ सौतेला व्यवहार किया। अब मैं किसी को भी विकास कार्यों में बाधा नहीं डालने दूंगा।
-प्रदीप टम्टा, निवर्तमान सांसद और कांग्रेस उम्मीदवार अल्मोड़ा