एनसीआर में शराब और जमीनों के कारोबारी रहे सचिन दत्ता को अचानक महामंडलेश्वर बनाना निरंजनी अखाड़े को भारी पड़ा है। उनको महामंडलेश्वर सच्चिदानंद गिरि बनाने पर संत जगत भड़क गया है।
वरिष्ठ संतों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्हें यह पद धारण करवाने में हरिद्वार के एक संत की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
उनको इस पद पर बाघम्बरी पीठ प्रयाग और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरि व हरिद्वार की दक्षिणकाली पीठाधीश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी ने एकाएक महामंडलेश्वर पद पर आसीन किया था। इस पर संत खेमा सख्त नाराज है।
दूसरी अखाड़ा परिषद के अखिल भारतीय अध्यक्ष श्रीमहंत ज्ञानदास ने दूरभाष पर बताया कि फर्जी संतों को नासिक और उज्जैन के कुंभ मेलों में सबक सिखाया जाएगा। एक शराब कारोबारी को जिस तरह अचानक महामंडलेश्वर बना दिया है, उससे समूचा संत जगत आहत है। सच्चिदानंद को संत जगत में कोई नहीं जानता।
हम पहले ही आसाराम, रामपाल आदि जैसे उन फर्जी संतों की सूची तैयार कर रहे हैं जिन्हें संत समाज से बहिष्कृत किया जाना है। ये सूची शीघ्र जारी होने वाली है।
'निरंजनी अखाड़े का यह कार्य संन्यास परंपरा के विरुद्ध'
अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबा हठयोगी दिगंबर ने कहा कि शराब कारोबारी को महामंडलेश्वर बनाना संतई पर प्रश्नचिन्ह है। ऐसे अखाड़ों का बहिष्कार करना चाहिए, जो फर्जी व्यक्तियों को संत के रूप में प्रतिष्ठित कर रहे हैं।
निरंजनी अखाड़े का यह कार्य संन्यास परंपरा के विरुद्ध है। शीघ्र ही संत समिति की अखिल भारतीय बैठक बुलाई जा रही है। संत समिति इस प्रश्न पर कड़ा रुख अपनाएगी।
गौरतलब है कि कुछ वर्ष पूर्व मुंबई की राधे मां को हरिद्वार के जूना अखाड़े में रातों-रात महामंडलेश्वर पद पर आसीन कर दिया था। संतों के विरोध के बाद अखाड़े ने उनका पद निलंबित कर दिया। इस संबंध में गठित जांच समितियों की रिपोर्ट अखाड़े को अभी तक प्राप्त नहीं हुई है।
जानिए, अखाड़ों में कैसे बनते हैं मंडलेश्वर
वास्तव में महामंडलेश्वर तो कोई अधिकृत अलंकरण ही नहीं है। पुराने जमाने में साधुओं की मंडलियां धर्म प्रचार के लिए गांव-गांव निकलती थी और मंडली के मुखिया को मंडलीश्वर कहा जाता था। धन और वैभव की लालसा में यह शब्द कब महामंडलेश्वर में बदल गया, खुद संत भी नहीं जानते।
अब कुंभ मेलों के अवसर पर महामंडलेश्वर बनाने की परंपरा चल पड़ी है। पिछले हरिद्वार और प्रयाग कुंभों में कुल मिलकर करीब 100 महामंडलेश्वर बनाए गए थे।
साधु बनने के पहले खुद करते हैं श्राद्ध
जो व्यक्ति घर त्यागकर ईश्वर प्राप्ति की कामना से बचपन में ही अखाड़ों में पहुंच जाता था, उसे 10-15 वर्ष परखने के बाद किसी कुंभ के अवसर पर विजयाहोम पद्धति द्वारा अमुख अखाड़े में आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा शामिल किया जाता था।
वह व्यक्ति खुद अपना श्राद्ध कर साधु बनता था। तब उसका शेष जगत से कोई संबंध नहीं रह जाता। इन साधुओं को 10-15 वर्षों तक परखने के बाद योग्यता के आधार पर पहले महंत, फिर श्रीमहंत, फिर मंडलीश्वर और अतियोग्य हो जाने के बाद आचार्य मंडलेश्वर पद पर आसीन किया जाता है।