उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ने सैन्य बलों व परिवारों के 15 प्रतिशत वोट बैंक को अपने प्रचार अभियान में टारगेट के तौर पर रखा है।
भाजपा के प्रचार कार्यक्रम से जुड़े लोगों की मानें तो चार फरवरी से शुरू होने वाले स्टार प्रचार अभियान में वन रैंक वन पेंशन और सर्जिकल स्ट्राइक पर फोकस होगा। वहीं, कांग्रेस उसके सही ढंग से अनुपालन नहीं होने की बात कर काट करेगी। सीएम हरीश रावत अपने संकल्प पत्र में अलग सैनिक कल्याण मंत्रालय मार्च तक खोलने का दांव खेल चुके हैं। उधर, केंद्र ने उत्तराखंड के युवाओं को भर्ती में रियायतें देने का दांव पहले ही चल दिया है। ऐसे में सर्वाधिक सैन्य वोट बैंक वाले जनपदों पौड़ी, पिथौरागढ़, टिहरी, नैनीताल और देहरादून में दोनों दलों ने पूर्व सैनिकों की टीमें भी उतार दी हैं।
सैनिकों, पूर्व सैनिकों सहित अर्द्धसेना बलों के मत किसी भी प्रत्याशी की जीत-हार में अहम रहते हैं। राज्य के पौने दो लाख पूर्व सैनिक व दिवंगत सैनिकों की पत्नियां, 90 हजार सेवारत सैनिक और सवा़ लाख अर्द्धसैनिक बलों से रिटायर और कार्यरत जवान व अधिकारी हैं। सैन्य मतों का भाजपा के प्रति रुझान होना कांग्रेस की बड़ी चुनौती है। कांग्रेस ने लेफ्टिनेंट जनरल टीपीसी रावत को लैंसडौन से टिकट दिया है, जहां आबादी के अनुपात में फौजी वोटों का सर्वाधिक घनत्व है।
लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी कांग्रेस में पहले से सक्रिय हैं, जिन्हें सैनिक कल्याण परिषद में कैबिनेट मंत्री का दर्जा सीएम हरीश रावत ने दिया था। हालांकि, रावत सरकार के सैनिक कल्याण मंत्री हरक सिंह रावत अब भाजपा के कोटद्वार से प्रत्याशी हैं। उनकी टक्कर अर्द्धसैनिक कल्याण मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी से होगी।
राज्य गठन के बाद तीन लोकसभा चुनाव में भाजपा को सैनिकों के पोस्टल बैलेट का 80 फीसदी मिलता रहा है, जिसे पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी की लोकप्रियता से जोड़ा जाता है। खंडूड़ी का चेहरा तो है ही साथ ही स्टार प्रचारकों में जनरल वीके सिंह इन्फेंट्री पृष्ठभूमि वाले सैन्य वोटरों को रिझाएंगे। रक्षा मंत्री की पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वाधिक जनसभाएं रखी जा रही हैं। दलों के सियासी रणनीतिकार की चिंता पोस्टल बैलेट को लेकर भी है।