आठ दिनों से चल रही नर्सों की हड़ताल के दौरान मरीजों को सबसे ज्यादा तकलीफ हड़ताल के लास्ट दिन हुई।
मंगलवार को नर्सों ने सुबह की शिफ्ट में काम करने के बाद हड़ताल के स्थगन की घोषणा कर दी थी। दोपहर दो से रात की आठ बजे के बीच की शिफ्ट से काम शुरू करने के बजाए नर्स रात की शिफ्ट में आईं।
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शाम के छह बजे दून अस्पताल के इमरजेंसी गेट से बनियावाला, गोरखपुर के रहने वाले दयाराम दाखिल हुए। उनका हाथ लहूलुहान था। खून बेड से नीचे फर्श पर टपक रहा था। दयाराम का भतीजा राजेंद्र कभी नर्सों के कमरे और कभी ईएमओ की तरफ देखकर चीख रहा था।
कुछ देर के बाद एक इंटर्न आया। उसने दयाराम को देखकर कहा कि जाओ रुई उठा लाओ। तब तक खून बहता रहा। दयाराम के हाथ से वीगो निकल गई थी। रुई लाने के बाद इंटर्न ने वीगो में पाइप लगा दिया।
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इस बीच की शिफ्ट के छह घंटे में मरीजों के साथ अधिक लापरवाही हुई। अस्पताल प्रबंधन के अधिकारी हड़ताल स्थगन से लापरवाह हो गए। उन्होंने इस शिफ्ट में वार्डों और इमरजेंसी में राउंड नहीं लिया। इंटर्न भी ढीले हो गए। विनोद कुमार रोगी को न देखे जाने के संबंध में ईएमओ एचएस भाटिया से इमरजेंसी में आकर शिकायत करता रहा।
नेहरू कालोनी के राजेश बिष्ट ने बताया कि रोगियों की ग्लूकोज की बोतल खत्म हो जाने पर कोई बदलने वाला नहीं था। प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक आरएस असवाल से पूछा कि क्या नर्सें काम पर आ गई हैं? वह बोले कि सूचना नहीं है। बात तो हो ही गई थी, अभी बाहर आ गया था।
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