उत्तराखंड में तेजी से घट रही खेती की जमीन से कृषि विभाग भी चिंतित है। हालांकि खाद्यान्न उत्पादकता (प्रति हेक्टेयर उपज) बढ़ने से इसका ज्यादा असर अभी नहीं दिख रहा है।
शहरीकरण और अन्य कामों की भेंट चढ़ी भूमि
सोमवार को राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा मिशन के तहत मुख्य सचिव एन रविशंकर की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस पर बातचीत हुई। कृषि विभाग की माने तो राज्य गठन से अब तक प्रदेश में करीब 70 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि शहरीकरण और अन्य कामों की भेंट चढ़ गई है।
कृषि निदेशक सीएस मेहरा के मुताबिक राज्य गठन के समय कृषि क्षेत्रफल 7.76 लाख हेक्टेयर था जो अब 7.06 लाख हेक्टेयर रह गया है। इस तरह हर साल पांच हजार हेक्टेयर खेती की जमीन कम हो रही है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है। गेहूं का उत्पादन पहले एक हेक्टेयर में 22 कुंतल था जो अब बढ़कर 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर हो गया है। इसी तरह धान की उत्पादकता 20 से बढ़कर 24 हो गई है।
बैठक में मुख्य सचिव ने दिए निर्देश
- खाली पड़ी कृषि भूमि का पुन: उपयोग हो
- मोटे अनाज और दलहन के उत्पादन बढ़ाएं
- भूमि में पोषक तत्वों की कमी दूर करने की योजना बने
- फसलों के विपणन की व्यवस्था सरस के माध्यम से हो
- जिलों में तराई बीज विकास निगम की यूनिट स्थापित हो