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पहाड़ों के भीतर लगातार सूख रही है धरती की कोख

Mon, 24 Apr 2017 03:19 PM IST
दीप जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा
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river - फोटो : file photo
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पहाड़ के भीतर धरती की कोख लगातार सूख रही है। केवल पांच दशक का हिसाब देखें तो कुमाऊं की आधी से ज्यादा नदियां सूखकर बरसाती नदियों में तब्दील हो गई हैं।
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हालत यह है कि 50 साल में अकेले अल्मोड़ा जिले में नदियों की लंबाई 1639 किमी (मुख्य नदी और उसकी सभी सहायक नदियों की कुल लंबाई) से घटकर 810 किमी रह गई है। पांच दशक में 50 प्रतिशत से ज्यादा सहायक नदियां, गाड़-गधेरे, धारे सूख गए हैं। अल्मोड़ा की प्रमुख कोसी की 36 और गगास की 70 सहायक नदियां (गधेरे) सूख चुकी हैं। यदि नदियों में जल संवर्द्धन के ठोस उपाय नहीं किए गए तो आने वाले 15 सालों में गगास, कोसी, रामगंगा, पनार आदि नदियां सूखने की कगार पर पहुंच जाएंगी।

उत्तराखंड का अल्मोड़ा जिला कभी आदर्श जंगल और जलवायु के लिए खास पहचान रखता था। अल्मोड़ा जिले में बहने वाली सभी नदियां सदाबहानी (हर मौसम में बहने वाली) नदियों की श्रेणी में आती थीं, मगर अब ऐसा नहीं है। अल्मोड़ा में पांच दशक पहले तक इन नदियों की कुल लंबाई 1639 किमी थी जो अब केवल 810 किमी रह गई है। यानी 829 किमी नदियां यहां सूखकर बरसाती नदियों में बदल गई हैं।
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कुमाऊं विश्वविद्यालय एसएसजे परिसर में भूगोल विभाग के अंतर्गत नेचुरल रिसॉर्स डाटा मैनेजमेंट सिस्टम (एनआरडीएमएस) का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित है। जाने माने भूगोल विद प्रो. जेएस रावत के निर्देशन में इस सेंटर ने भौगोलिक सूचना तंत्र (जीआईएस) आधारित नदियों की लंबाई, उनकी सहायक नदियों का करीब 10 सालों तक अध्ययन किया है। प्रो. रावत ने बताया कि मुख्य रूप से अल्मोड़ा जिले में पश्चिमी रामगंगा, कोसी, पनार, सरयू, गगास नदियां बहती हैं।

गगास नदी की 70, कोसी की 36, सुयाल की 30, पश्चिमी रामगंगा की 134, सरयू नदी की 24, जौंगण नदी की 30, पनार की 32 और सहायक नदियों को मिलाकर कुल 332 सहायक नदियां यहां की सूखकर बरसाती सहायक नदियों में बदल गई हैं। नतीजा यह है कि मुख्य नदियां गर्मियों में करीब-करीब सूखने की स्थिति में पहुंच जाती हैं। अल्मोड़ा को मॉडल मानते हुए जीआईएस के वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यही स्थिति कुमाऊं के अन्य जिलों के साथ ही अन्य पर्वतीय राज्यों की भी है। 

गगास भी अब मौसमी नदी में तब्दील हो रही 
रानीखेत नगर समेत आसपास के सैकड़ों गांवों की प्यास बुझाने और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने वाली गगास नदी की हालत भी दिनों दिन खराब होती जा रही है। कभी इस नदी में लबालब पानी रहता था, लेकिन पिछले कुछ सालों में इस नदी का स्तर घटता जा रहा है और अब यह सदाबहानी नदी के बजाय मौसमी नदी का रूप लेती जा रही है। प्रो.जेएस रावत के मुताबिक अगर किसी भी साल में कोई नदी एक दिन के लिए भी पूरी तरह सूख जाए तो वह नदी सदाबहानी के बजाय मौसमी नदी की श्रेणी में आ जाती है। उन्होंने बताया कि गगास नदी भी जून 2005 में आखिरी छोर (भिकियासैंण) में एक बार एक-दो दिन के लिए पूरी तरह सूख चुकी थी। फिर बारिश होने के बाद इसमें पानी चलने लगा। 

नदियां सूखने के कारण अनेक हैं
पर्वतीय इलाकों में नदियों के बरसाती नदियों में बदलने का सबसे बड़ा कारण घटते जंगल हैं। मानव लगातार जंगलों को काट रहा है। जंगल ही बरसाती पानी को रोककर धरती में वाटर रिचार्ज करने के लिए सबसे बड़ा कारक है। मगर पिछले पांच दशकों में लगातार कम होते जंगलों के साथ ही चौड़ी पत्ते की प्रजाति के पेड़-पौधे भी जंगल से गायब हो रहे हैं। चौड़ी प्रजाति के पेड़ों के जंगल में सड़ी पत्तियां, मिट्टी, छोटे पौधों की एक लेयर बनती है जो बरसाती पानी को रोककर धीरे-धीरे सोखकर धरती के अंदर पहुंचाती है, मगर चौड़ी पत्ती के जंगल नहीं होने से ऐसा नहीं हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन से बारिश ने आचरण बदला 
अल्मोड़ा। जलवायु परिवर्तन के चलते बरसात का आचरण भी लगातार बदल रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अब पहले की तरह बारिश धीरे-धीरे नहीं होती है और अधिक तीव्रता वाली बारिश का पानी तेजी से बहकर निकल जाता है। बारिश का 60 से 70 प्रतिशत पानी बहकर चला जाता है और यह पानी आगे जाकर तबाही भी मचाता है। 
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इन तीन उपायों से बच सकती हैं नदियां 
अल्मोड़ा। प्रो. जेएस रावत के मुताबिक नदियों को बचाने के लिए नदियों के रिचार्ज स्पेस पर कृत्रिम रूप से धरती के भीतर बरसाती पानी पहुंचाया जाना जरूरी है। इसके तीन उपाय हैं। पहला, नदियों के उद्गम स्थल के ऊपर की तरफ छोटे-छोटे गड्ढे (इन्फिल्ट्रेशन ट्रंच) बनाना, दूसरा इन्फिल्ट्रेशन होल बनाना और तीसरा बायोपरफोलेशन टैंक यानी गधेरों का पानी रोकने के लिए पिरूल (चीड़ की पत्ती) के छोटे-छोटे अवरोध बनाना। इन तीनों ही विधियों से पानी की धरती के अंदर पहुंचने में मदद मिलेगी। यानी धरती के पानी सोखने की क्षमता को बढ़ाना ही नदियां बचाने का एक मात्र विकल्प है।
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