जिन बच्चों को कभी नाकारा समझा जाता था, उन्हीं में आज लोगों को भविष्य के हीरो नजर आने लगे हैं। यह बच्चे कभी अपना नाम बताने में भी झिझकते थे, लेकिन आज ये दूसरे बच्चों के लिए रोल मॉडल बन गए हैं।
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कालसी के एकलव्य आदर्श आवासीय जनजाति विद्यालय में नौवीं में पढ़ने वाले जौनसारी, भोटिया, बोक्सा और थारू जनजाति के इन 15 बच्चों पर जादू की छड़ी चलाई रंगमंच ने।
रंगमंच से जुड़ने के बाद मानो इनका कायाकल्प ही हो गया। मंच पर आने एक बाद इन बच्चों ने जाना कि वे भी किसी से कम नहीं।
पढ़ाई और खेलकूद में भी जादू बिखेरा
मंच पर ही नहीं ये बच्चे अब पढ़ाई और खेलकूद में भी जादू बिखेर रहे हैं। शिक्षक बताते हैं कि पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले इन बच्चों ने आसपास के माहौल में जो देखा, सीखा बस वही उनके दिल में बस गया।
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इन्हें किसी के सामने बोलने में भी डर लगता था। सवाल का जवाब आने के बावजूद चुप्पी नहीं टूटती थी। स्कूल की किसी गतिविधि में कभी भागीदारी नहीं निभाते थे।
लेकिन, रंगमंच ने इन बच्चों की दिशा ही बदल दी। प्रधानाचार्य डॉ. गिरीश चंद्र बड़ोनी का कहना है कि इन बच्चों में आया बदलाव आश्चर्यजनक है।
ये रॉ मैटीरियल हैं...
संभव रंगमंच परिवार के अभिषेक मैंदोला पिछले चार सालों से इन बच्चों को ट्रेंड कर रहे हैं। वे खुद बच्चों की प्रतिभा के कायल हो गए हैं।
अभिषेक ने बताया कि मैंने स्कूल के बच्चों को रंगमंच से जोड़ने की बात कही तो प्रधानाचार्य ने बताया कि यही 15 बच्चे किसी गतिविधि में शामिल नहीं हुए हैं। बाकी बच्चे अपना-अपना विषय चुन चुके थे।
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इन बच्चों के संबंध में प्रधानाचार्य ने कहा था कि ये रॉ मेटीरियल है, मेहनत कर सको तो ले लो। मैंने बिना सोचे हां कर दी। बच्चों को जबरदस्ती रंगमंच से जोड़ा, लेकिन अब विश्वास नहीं होता कि यह वही बच्चे हैं।
रंगमंच से लेकर पढ़ाई तक अव्वल। मुश्किल से मुश्किल किरदार को मिनटों में कर लेते हैं। रंगमंच ने जिस तरह से इनकी छिपी हुई प्रतिभा को उभारा है, वह जादू से कम नहीं है।
बच्चों की जुबानी रंगमंच की कहानी
चकराता के कुनावा का विजेंद्र तोमर का छठी कक्षा में दाखिल हुआ तो बेहद संकोची था। न कुछ बोलता न पढ़ाई में उसका ध्यान लगता।
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हिंदी के शब्द तक नहीं बोल पाता था, लेकिन अब पूरी स्क्रिप्ट याद कर लेता है। विजेंद्र का कहना है कि अब मेरे नंबर भी अच्छे आते हैं, सब रंगमंच की वजह से हो पाया।
कोटि के रूपाऊं की रहने वाली पूनम रावत बेहद शर्मीली थी। अध्यापकों सवाल पछूते-पूछते थक जाते थे, लेकिन उसकी चुप्पी नहीं टूटती थी।
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आज कोई नहीं कह सकता कि यह वहीं पूनम है। आज पूनम स्कूल की सेकेंड कैप्टन है। नौवीं में पढ़ने वाली पूनम बड़े होकर डॉक्टर बनना चाहती।
लूहन लखवाड़ निवासी विकास जब स्कूल में आया तो काफी नकारात्मक था। बच्चों से झगड़ा और शैतानी में ही उसका पूरा दिन कट जाता था।
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वह किसी की बात नहीं सुनता था। फिर विकास को रंगमंच से ना सिर्फ जोड़ा गया, बल्कि इसका लीडर बनाया गया। आज वह बेहद जिम्मेदारी से अपनी टीम का नेतृत्व करता है।
बच्चों में यह आया बदलाव
स्मरणशक्ति बढ़ी, आत्मविश्वास बढ़ा, कुठाएं खत्म हुई व हिंदी अनुवाद में सुधार आया है।