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एक फिल्म के लिए इनके सामने गिड़गिड़ाए थे राजकपूर

Mon, 12 May 2014 02:53 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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पूरे 10 साल तक हिना फिल्म बनाने का ख्याल संजोए राजकपूर इसे सिल्वर स्क्रीन पर साकार करने के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास के दरवाजे मदद मांगने पहुंचे थे।
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फिल्म मेकर सुबोध लाल ने बताया कि इस आइडिया पर फिल्म बनाने को राजकपूर बहुत दिन तक परेशान रहे थे। उन्होंने बताया कि राजकपूर चाहते थे कि भारत-पाक सरहद के बैकग्राउंड पर कोई फिल्म बनाई जाए।

बाद में उन्होंने के अब्बास से मिन्नत की। फिर हिना फिल्म बनी। शराब पीकर पहुंचे राजकपूर को एक बार उन्होंने अपने घर से भगा दिया था। लेकिन वह राजकपूर को चाहते बहुत थे।
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क्रूसेडर थे अब्बास

राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी की पहल पर देश भर के साथ ही राजधानी देहरादून में ख्वाजा अहमद अब्बास शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है।

रविवार को राजभवन में आयोजित दो-दिवसीय कार्यक्रम के समापन पर डॉ. कुरैशी ने कहा कि अब्बास एक क्रूसेडर थे। उन्होंने लेखक, पत्रकार और एक फिल्म मेकर के तौर पर जिंदगी की जटिलताओं को उकेरा।

वक्त के दस्तावेज हैं ख्वाजा की फिल्में

‘अदालत लगी है। न्यायाधीश कटघरे में खड़े एक नौजवान से पूछते हैं- कहां रहते हो? कब्र में रहते हैं। क्या करते हो? नौकरी की तलाश।

साहब कब्र बढ़िया जगह है। कोई इंस्पेक्टर परेशान नहीं करता।..कत्ल में फंसने से किसी ने पहली बार खैरियत तो पूछी। चलो अब जेल में भरपेट खाना मिलेगा’

यह क्लिपंग है, ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म दि नक्स्लाइट्स की। रविवार को राजभवन में आयोजित ख्वाजा अहमद अब्बास शताब्दी समारोह-एक दिग्गज और उसकी विरासत कार्यक्रम में इसे दिखाया गया।

यह क्लिपंग देखते ही युवा आक्रोश की वजहें लोगों के जेहन में उभर आईं। साथ ही उस दौर और हालात ने जेहन के ‘बैकग्राउंड’ में अपनी हाजिरी दर्ज करा दी।
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‘यह मुंबई है यहां सब अंधे बसते हैं'

इसके बाद फिल्म श्री 420 की क्लिपंग राजभवन सभागार के सिल्वर स्क्रीन पर उभरी। ‘यह मुंबई है यहां सब अंधे बसते हैं। यहां सिर्फ पैसा ही पूजा जाता है।

पढ़े-लिखे हो, मेहनती हो, ईमानदार हो, तब तो नौकरी नहीं मिलेगी। हां, भीख जरूर मिल सकती है।’ मुश्किल से आधा मिनट की इस क्लिपंग ने मायानगरी की पोल खोल कर रख दी।

यह दो क्लिपंग तो बतौर बानगी बताई हैं। इस मौके पर अन्य क्लिपंग भी दिखाई गईं। इन क्लिपंग से समाज की दर्दभरी कड़ुवाहट को बड़े प्रभावी रूप से मजाकिया लहजे में पेश करने के  ख्वाजा अहमद अब्बास के हुनर की तस्दीक हो गई।

इस मौके पर समीक्षकों ने कहा कि ख्वाजा की निगाह समाजी हकीकत के दुखती रख पर रहती थी। उनकी फिल्में अपने वक्त की दस्तावेज हैं।

इस मौके पर फिल्म मेकर सुबोध लाल, यूसुफ सईद, डा. रश्मि दोराय स्वामी, डा. सैयद हामिद आदि ने विचार व्यक्त किए।
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