केदारनाथ में आए जलप्रलय ने देशभर में हाहाकार मचा दिया। उस वक्त सरकार द्वारा कई दावे किए गए जो अभी तक अधूरे हैं। सर्दी का मौसम भी आने वाला है, लेकिन अभी तक यह नहीं तय हुआ है कि विस्थापितों को कहां बसाया जाएगा। सरकार के ढीले रवैये को देखकर तो लगता है कि अब आपदा ग्रस्त लोग 'हिमयुग' से परेशान होंगे।
आपदा को बीते तीन माह का वक्त बीत चुका है लेकिन उत्तराखंड के जख्म भरे नहीं हैं। केदारघाटी (रुद्रप्रयाग) के अलावा चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के कई इलाके अब भी बेहाल हैं।
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कहीं अब तक सड़क नहीं बनी तो कहीं भूस्खलन से डरे-सहमे लोग घर छोड़ टेंटों में रहने को विवश हैं। कई जगह लोग मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। स्वास्थ्य, बिजली, पेयजल सुविधाएं कई इलाकों में अब भी नहीं बहाल हो पाई हैं।
केदारनाथ की पूजा शुरू कर हालात सामान्य होने का संदेश देने की कोशिश की गई, पर राहत और पुनर्वास को खास तवज्जो नहीं दी गई। बिजली, पानी और रोजगार की बड़ी चुनौतियों से पार पाने को सरकार खास कुछ नहीं कर पाई है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बिजली नाममात्र की है।
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सड़कें बंद है और आम जनता दुर्गम पैदल रास्ते तय कर आवाजाही को मजबूर है। आपदा में करीब 2400 सड़कें क्षतिग्रस्त हुई थीं, इनमें से लगभग 271 सड़कों को यातायात के लायक बनाना बाकी है। 150 से अधिक गांव सड़कों के नहीं सुधरने से निर्वासन का जीवन जी रहे हैं।
कई जगह लोग राशन की किल्लत से जूझ रहे हैं। पेयजल योजनाओं का भी बुरा हाल है। करीब 400 गांवों का विस्थापन जरूरी बताया जा रहा है। इनके लिए सरकार ने करीब 2000 अस्थायी आवास बनाने की बात कही है। पहले चरण में 750 आवास बनाए जाने हैं, लेकिन अभी तक तय नहीं है कि विस्थापितों को कहां बसाया जाएगा।
सर्दी दस्तक दे रही है। ऐसे में टेंटों में रहने वाले लोगों का क्या होगा, यह सवाल बड़ा है। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल तो और बुरा है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। केदारनाथ यात्रा पर तीस सितंबर को यात्रा पर फैसला होना है।
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हो सकता है अक्तूबर से यात्रा शुरू भी हो जाए। लेकिन सड़कों की हालत अब भी कई जगह जानलेवा है। केदारनाथ में पूजा शुरू करवा दी गई, लेकिन वहां तक पहुंचने के रास्ते दुरुस्त नहीं हुए हैं। 15 जून से बंद गंगोत्री हाईवे पर उत्तरकाशी में लालढांग से आगे यातायात बहाल नहीं हो पाया है। बदरीनाथ राजमार्ग को भी दुरुस्त करने का काम चल रहा है।
बिजली
सरकारी दावा है कि केदारघाटी के 3747 गांवों में बिजली पहुंचाई जा चुकी है सिर्फ 11 गांवों तक बिजली पहुंचानी है। वास्तविकता यह है कि पूरी केदारघाटी में बिजली नाममात्र की ही है। अधिकतर समय बिजली गायब ही रहती है। इसका प्रमुख कारण है बेहद लंबी लाइन और ओवरलोडिंग होना। ऊखीमठ का 33 केवी का सबस्टेशन फिलहाल काम नहीं कर रहा है।
ऐसे में 11 केवी के पोखरी सबस्टेशन से फीड किया जा रहा है। सुमाड़ी में ट्रांसफार्मर लगाया भी गया था पर यह ट्रांसफार्मर भी जल गया। अब केदारघाटी 11 केवी के सब स्टेशन पर निर्भर है। यही हाल बदरीनाथ घाटी का है। यहां भी बिजली की आंखमिचौली जारी है।
पेयजल
आपदा के कारण कुल 247 पेयजल योजनाओं के नुकसान की बात की जा रही है। इनमें से 15 योजनाओं को अभी शुरू किया जाना बाकी है। पर हकीकत कुछ और ही है। खुद सरकार का अनुमान है कि क्षतिग्रस्त पेयजल योजनाओं को सुधारने के लिए करीब तीन सौ करोड़ की दरकार है।
केदारघाटी की अधिकतर पेयजल योजनाएं ध्वस्त हैं। इसको देखते हुए बरसाती स्रोतों को टैप कर पेयजल उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। पर यह अस्थायी समाधान बरसात बंद होने और इन स्रोतों के समाप्त होने पर बेकार साबित होगा।
रोजगार
रोजगार का सवाल आपदा के तीन माह बाद भी नहीं सुलझा। पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक आकलन के अनुसार यात्रा जल्द शुरू नहीं होती है तो करीब तीन लाख लोग पूरी तरह बेरोजगार हो जाएंगे। ये वे लोग हैं जो होटल, मठ, मंदिर, धर्मशाला, परिवहन आदि में कार्य करते हैं।
करीब 14,000 लघु एवं कुटीर उद्योगों के नुकसान की बात भी सामने आई है। सबसे अधिक पर्यटन क्षेत्र प्रभावित है। तीन माह बाद भी मसूरी, नैनीताल, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि आपदा से नुकसान की जद में न आने वाले पर्यटक स्थलों से पर्यटक गायब हैं।
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