2013 की आपदा से व्यापक रूप से प्रभावित केदारनाथ धाम छह वर्षों से पुनर्निर्माण से गुजर रहा है। धाम की भव्यता और सुंदरता दिनोंदिन निखर रही है। वैज्ञानिक तकनीक से लेकर पारंपरिक शैली से यहां निर्माण कार्य हो रहे हैं, लेकिन सात वर्ष बाद भी केदारनाथ तक आसान पैदल पहुंच के विकल्प नहीं तलाशे गए हैं। जो पैदल मार्ग उपयोग में है, वह एवलांच व भूस्खलन जोन में है, जिससे यहां खतरा बढ़ रहा है।
आपदा में व्यापक तबाही के बाद केदारनाथ मंदिर व केदारपुरी की सुरक्षा, सौंदर्य और संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। अक्तूबर 2017 में पीएम मोदी द्वारा केदारनाथ पुनर्निर्माण को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल करने के बाद इस क्षेत्र को भव्य व दिव्य बनाने के कार्य हो रहे हैं, लेकिन आज भी केदारनाथ तक आसान पहुंच के लिए शासन-प्रशासन अपनी सोच को विकसित नहीं कर पाया है।
मार्च 2014 में मंदाकिनी नदी के बाई तरफ से निम द्वारा जो 9 किमी का नया पैदल मार्ग बनाया गया है, वहां अधिकांश एवलांच जोन में है। यहां नीचे से बह रही मंदाकिनी नदी के बहाव से हो रहे भूकटाव भूस्खलन का खतरा अलग से है, जिससे यहां बसे पड़ाव भी सुरक्षित नहीं हैं।
वहीं, वर्ष 2014-15 में केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग द्वारा जो दो वैकल्पिक पैदल मार्ग तोषी-केदारनाथ व चौमासी-केदारनाथ बनाए गए थे, वे भी बदहाल पड़े हुए हैं। केदारनाथ के विधायक मनोज रावत का कहना है कि वर्ष 2016 में हिटो केदार अभियान के तहत पुराने ट्रेकों की खोज की गई थी, जिनका उद्देश्य केदारनाथ को चारों तरफ से लिंक करना था, लेकिन प्रदेश सरकार बीते तीन वर्षों में इस दिशा में कोई कार्य नहीं कर पाई है।