फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हां! मैं यूकेडी को हाशिये पर लाने का जिम्मेदार हूं: काशी सिंह ऐरी 

Sun, 25 Dec 2016 11:42 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
काशी सिंह ऐरी - फोटो : fb
विज्ञापन
उत्तराखंड की सियासत में काशी सिंह ऐरी एक जाना-पहचाना नाम है। ऐरी ने क्षेत्रीय सरोकारों की सियासत जिस अंदाज में की, उसका अवसान उतना ही हताश करने वाला रहा है। उत्तराखंड बनने से पूर्व तीन बार विधायक रहे ऐरी की राजनीतिक सफलता उन्हें नवोदित राज्य के नायक के तौर पर पेश कर रही थी।
विज्ञापन


मगर पिछले सोलह सालों की यात्रा में ऐरी अपने सियासी कद को बढ़ाना तो दूर उसे बरकरार भी नहीं रख सके। उनके आलोचक आज उनकी गिनती राज्य के विफल, महत्वाकांक्षी और अवसरवादी नेताओं में करते हैं। पर्वतीय राज्य की मूल अवधारणा के पक्षधरों को राज्य आंदोलन के इस धाकड़ नेता ने तब बेहद हताश और निराश किया जब भाजपा और कांग्रेस से मुठभेड़ करने के बजाय वे यूकेडी की सत्ता के लिए आपस में लड़ते-भिड़ते रहे।

जनआकांक्षाओं से जुड़ी पार्टी तमाशा बन गई। पार्टी को हाशिये पर लाने के सवाल पर ऐरी कहते हैं, हां! मैं जिम्मेदार हूं। जब हम सफलता का श्रेय ले सकते हैं तो विफलता भी हमारे खाते में आएगी ही। लेकिन सबसे बड़े जिम्मेदार दिवाकर भट्ट हैं, जिन्होंने पार्टी को टूट के कगार पर ला दिया। बहरहाल, ऐरी अब नये अवतार में हैं। वे दोबारा दल को खड़ा कर युवा तुर्कों को आगे लाने के अभियान परहैं। विरोधी उनकी इन कोशिशों से तिलमिलाए हैं।
विज्ञापन


उक्रांद के संरक्षक और इस चुनाव में पार्टी के सीएम चेहरे काशी सिंह ऐरी से दल के स्वर्णिम दौर से लेकर हाशिए पर आने के बाद दोबारा उठ खड़े होने सहित क्षेत्रीय सरोकारों पर विशेष संवाददाता अरुणेश पठानिया ने तीखे सवाल किए। उन्होंने बड़ी साफगोई से कमियों को स्वीकारा और आरोपों को नकारा भी। इस बातचीत के साझीदार आप भी बनिए-
     
- क्षेत्रीय सरोकारों की राजनीति करने वाला उक्रांद चुनावों में असफल क्यों हुआ?
- यह बात सही है कि उत्तराखंड क्रांति दल क्षेत्रीय सरोकारों को लेकर ही अस्तित्व में आया था। दल के हाशिये पर जाने की तीन अहम वजह हैं। पहला 1994 में जब राज्य आंदोलन चरम पर था तो कर्मचारी संगठन, छात्र संगठन और अन्य संगठनों ने हमारे बैनर तले आने की जगह दूसरा विकल्प मांगा तो हमने उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति बना दी। समिति बनने से उक्रांद को नुकसान हुआ। हम ‘पॉलीटिकल माइलेज’ नहीं ले पाए। दूसरा 1996 के चुनाव में पार्टी ने निर्णय लिया कि अलग राज्य बनाओ नहीं तो चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे। हम चुनाव में नहीं उतरे दूसरी तरफ हमारे दबाव में पीएम देवेगौड़ा ने लाल किले से अलग राज्य बनाने की घोषणा कर दी। हमारा उद्देश्य तो पूरा हुआ, लेकिन चुनाव नहीं लड़ने से हमारा वोट शेयर गिर गया। तीसरा कारण वरिष्ठ नेताओं के बीच अहं और अतिमहत्वाकांक्षा की जंग ने दल को कई बार टूट की कगार पर पहुंचा दिया। इतने वर्ष में दल अपने लिए संसाधन तक नहीं जुटा पाया, जबकि दो बार हम सरकार में रहे हैं। 
 
- आप खुद उक्रांद को हाशिये पर लाने के लिए जिम्मेदार हैं?
- हां! मैं जिम्मेदार हूं, यह आप कह सकते हैं। सीनियर लीडर होने के नाते जब हम सफलता का श्रेय लेते हैं तो विफलता भी हमारे खाते में आए। लेकिन अगर पार्टी इतिहास में जाएं तो बहुत से तथ्य सामने आएंगे। सबसे बड़े जिम्मेदार दिवाकर भट्ट हैं, जिन्होंने अपनी बात मनवाने के लिए कई बार पार्टी को विभाजित किया। जब तक स्वर्गीय बडोनी जी रहे दिवाकर की मनमानी नहीं चली, लेकिन उनके जाने के बाद दिवाकर ने सिर्फ पार्टी तोड़ने का काम किया। उन्हीं कि जिद पर वर्ष 2010 रामनगर पार्टी अधिवेशन में त्रिवेंद्र पंवार पार्टी अध्यक्ष बने, जबकि कैडर मेरे पक्ष में था। दिवाकर के पार्टी तोड़ने की धमकी के चलते मैंने पंवार को अध्यक्ष बना दिया। मेरी गलती यह है कि मुझे सख्ती से पेश आना चाहिए था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। और आज दल की स्थिति आपके सामने है।
 
- आपके नेताओं पर सत्ता की भूख का आरोप है?
- हमारे दल में आंदोलन से निकले नेता रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों ने पार्टी के दम पर शीर्ष हासिल करने के बाद दल को दरकिनार किया। वर्ष 2002 में हमारे चार विधायक थे, लेकिन हम सरकार के साथ नहीं गए। वर्ष 2007 में हमारे तीन विधायक थे। हमने यह सोच कर भाजपा की बीसी खंडूड़ी सरकार को सशर्त समर्थन दिया कि हम सरकार की अस्थिरता नहीं चाहते थे। कुछ लोग खुलकर गठबंधन के पक्ष में आए। मुझे भी हिल्ट्रान का अध्यक्ष बनाया गया। यह सब सरकार में मंत्री रहे दिवाकर भट्ट के कहने पर हुआ। इस दौरान पार्टी के लिए किसी ने कुछ योगदान नहीं दिया। उलटा 2010 में सरकार के समर्थन के मुद्दे पर तत्कालीन अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार ने मंत्री दिवाकर और विधायक ओम गोपाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। वर्ष 2012 में एक सीट जीतकर सरकार का हिस्सा बने। आप इसे हमारी सियासी नाकामी कह सकते हैं।

- आप के नेता सरकार में जाते ही पार्टी से क्यों बेगाने हो जाते हैं?
- इसे आप कड़वी सच्चाई बोल सकते हैं। सत्ता में भागीदारी कर नेताओं ने खुद को मजबूत किया, लेकिन पार्टी को नुकसान हुआ। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवाकर भट्ट की बात कर लें या फिर मौजूदा सरकार में मंत्री प्रीतम सिंह पंवार की बात करें, पार्टी को किसी स्तर पर फायदा नहीं मिला। नेता पार्टी के दम पर है, यह अकसर हमारे नेता भूल जाते हैं।

- आरोप है कि ऐरी और दिवाकर ने सेंकेंड लीडरशिप इमर्ज नहीं होने दी?
-  ऐसा नहीं है। त्रिवेंद्र पंवार दूसरी पंक्ति की लीडरशिप है, जिसे अध्यक्ष तक बनाया गया। नतीजा आपके सामने है कि दल का विभाजन हुआ। उन्होंने पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश की। अब एक बार फिर हम युवाओं को आगे लेकर आए हैं। केंद्रीय अध्यक्ष पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी हैं, जबकि कार्यकारी अध्यक्ष पंकज व्यास हैं। यह दोनों ही चालीस पार नहीं हैं। हमने इस बार जो प्रत्याशी घोषित किये हैं, उनमें मुझे छोड़ सभी युवा हैं।


- आप लोग दावा हरीश रावत की मुखालफत का करते हैं, जबकि उपचुनाव में उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारने की बजाए उनका प्रचार किया?
- ऐसा हमने सिर्फ हरीश रावत के उपचुनाव में नहीं किया। हम किसी भी सीएम के उपचुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारते। एनडी तिवारी के रामनगर उपचुनाव में उनके खिलाफ हमारा प्रत्याशी नहीं था, वर्ष 2007 में बीसी खंडूड़ी के उपचुनाव में हमारा प्रत्याशी नहीं था। वर्ष 2012 में विजय बहुगुणा के सितारगंज उपचुनाव में हमारा प्रत्याशी नहीं था। उसी तरह हरीश रावत के उपचुनाव में हमने प्रत्याशी नहीं उतारा, जबकि वे मेरे विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े। पार्टी और मैं कभी हरीश रावत के पक्षधर नहीं हैं। हमने केवल 18 मार्च 2016 वाले मामले में सरकार को सपोर्ट किया, क्योंकि केंद्र ने गलत किया था।

- इस प्रदेश में तीसरे विकल्प की वाकई कोई संभावना है?
- उक्रांद ने बहुत सी गलतियां की है, जिससे हम इस स्थिति में पहुंचे। लेकिन हकीकत यह है कि आप को पहाड़ पर आज भी उक्रांद से जुड़े लोग मिलेंगे। जनभावनाएं हमारे साथ थीं और रहेंगी, लेकिन हम अब तक नाकाम रहे। हम अपनी गलतियों के लिए जनता से माफी मांग कर इस बार फिर उनके सामने भाजपा कांग्रेस की पोल खोलेंगे। यूपी, हरियाणा, पंजाब समेत कई जगह क्षेत्रीय दल पनपे, लेकिन उसकी वजह दूसरी रही। हमारे यहां स्थिति बहुत अलग है। एक बार फिर हम वाम दलों और अन्य क्षेत्रीय दलों से मिलकर चुनाव में उतरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

- कैबिनेट मंत्री प्रीतम दल में हैं या नहीं ?
- उनको निलंबित कर तत्कालीन अध्यक्ष ने गलती की। वह क्षेत्रीय मानसिकता वाले नेता हैं। अगर वह चुनाव हमारे दल से लड़ना चाहते हैं, तो स्वागत है।

- 16 बरस में ऐसी एक उपलब्धि तो बताएं जिसे लेकर आप जनता के बीच जाएंगे?
- हम सरकार में रहे तब भी हम शर्त के साथ गए। गैरसैंण राजधानी, पलायन, रोजगार से लेकर हम कई मुद्दों पर आज भी अपनी राय रखते हैं। हमने इसके लिए कई कोशिशें की हैं। भाजपा-कांग्रेस आज तक यूपी से परिसंपत्तियों का बंटवारा नहीं करवा पाई। हरिद्वार जबरन राज्य को थोप दिया गया, जबकि हम केवल कुंभ क्षेत्र को उत्तराखंड में शामिल करने की मांग को लेकर चले थे।

- आज भी हम यूपी का ही मॉडल लेकर चल रहे हैं ?
- मैं उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक विधायक रहा हूं। जब उत्तराखंड का गठन हुआ तो यूपी में भाजपा सरकार ने नए राज्य के खिलाफ 26 संशोधन किये। 3 संशोधन केंद्र ने हम पर थोपे। हरिद्वार का बड़ा हिस्सा हमें दे दिया, जबकि हम केवल कुंभ क्षेत्र चाहते थे। जल संसाधनों पर उनका कब्जा आज भी है। बिना यूपी की अनुमति के हम गंगा-यमुना और अन्य सहायक नदियों का जल इस्तेमाल नहीं कर सकते। सीलिंग एक्ट यूपी का लागू करना मजबूरी है। तब की यूपी सरकार ने राज्य के साथ अन्याय किया और बेहद खेदजनक है कि उसी मॉडल पर पहले और आज भी राज्य सरकार चल रही हैं।

- आप पार्टी का सीएम चेहरा हैं, कितनी उम्मीद है दल से?
- अब कोई गुट या खेमा नहीं है। चुनाव आयोग ने हमारे दल को असल उक्रांद माना है। इस बार सभी 70 सीटों पर उतरने की रणनीति है, लेकिन हमारा फोकस जीत की अधिक संभावना वाली एक दर्जन सीटों पर रहेगा। जो उक्रांद छोड़ चुके हैं, उनके लिए भी हमारे दरवाजे खुले हैं। मुझ पर पार्टी अध्यक्ष ने विश्वास जताया है, लेकिन कई चुनौतियां है जिसमें संसाधनों की कमी सबसे अहम है। इस बार नया यह भी है कि प्रवासी उत्तराखंडी हमें समर्थन दे रहे हैं। हमारा ऑनलाइन पोर्टल तैयार है। पिछले चुनाव से यह चुनाव बेहतर रहेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें