करवाचौथ के मौके पर हम आपको दो ऐसी पत्नियों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी आंखों से उनके नेत्रहीन पति सारा संसार देखते हैं।
सितारगंज में पैर से विकलांग पत्नी गीता अपने नेत्रहीन पति का सहारा बनी हुई हैं। ज्ञानेंद्र और गीता 22 साल से एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं। दोनों के बीच प्रेम की यह मिसाल अन्य दंपतियों के लिए प्रेरणादायक है।
किच्छा रोड एक्सिस बैंक कालोनी निवासी नगर के राइंका से 31 मार्च 2014 को हिंदी प्रवक्ता के पद से रिटायर हुए जन्मांध ज्ञानेंद्र दत्त शुक्ल (62) मूलरूप से ग्राम कुर्रइया उदनापुर सीतापुर के रहने वाले हैं। लखनऊ यूनीवर्सिटी से साहित्य हिंदी विषय से एमए करने के बाद 1981 में प्रवक्ता के पद पर भर्ती हुए और पहली पोस्टिंग 1981 में नैनीताल जिले के पियूड़ा मुक्तेश्वर राइंका में हुई।
जुलाई 1986 को पियूड़ा राइंका से सितारगंज राजकीय इंटर कालेज उनका स्थानांतरण हो गया और तब से 31 मार्च 2014 तक यहां हिंदी विषय के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे। जिसके बाद वह सेवानिवृत्त हो गए। 18 अप्रैल 1993 को जन्मांध शुक्ल का विवाह खटीमा के केशव दत्त भट्ट की बेटी पैर से विकलांग गीता शुक्ल के साथ हुआ।
गीता ने बताया कि पिछले 22 सालों से दोनों एक दूसरे के साथ वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। सुख हो या दुख, मिलकर सामना करते हैं और हर साल वह अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं। गीता कहती है कि विकलांगता कभी भी किसी के आड़े नहीं आती, बस जीवन जीने का सलीका होना चाहिए।
वह पैर से विकलांग हैं तो उनके पति शुक्ल जन्म से नेत्रहीन। उनके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा शुभम बीटेक में अध्ययनरत है और छोटा बेटा हिमांशु बीए की शिक्षा ले रहा है।
टीचर ही नहीं, संगीतकार भी हैं शुक्ल जी
हिंदी साहित्य विषय के प्रवक्ता जन्मांध ज्ञानेंद्र दत्त शुक्ल टीचर ही नहीं, एक अच्छे संगीतकार भी हैं। वे जब हारमोनियम, तबला और ढोलक पर थाप देते हैं तो हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। रिटायरमेंट के बाद शुक्ल जी अब अपने घर पर आसपास के बच्चों को संगीत सिखा रहे हैं।