अगस्त्यमुनि ब्लाक का कंडारा व जाखणी सहित अन्य क्षेत्रों के कई गांव सैनिक बाहुल्य हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनकी तीन पीढिय़ा सेना से जुड़ी हुई हैं। देश के लिए मर-मिटने का जज्बा लिए ये जवान सीमाओं पर मुस्तैद हैं। वर्ष 1962 का चीन युद्ध हो चाहे, वर्ष 1965 व 1971 का पाक युद्ध या फिर वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध, जनपद के रणवांकुरों ने अपना लोहा मनवाया है।
लेकिन आज भी कई सैनिकों के गांवों को मूलभूत सुविधाएं नसीब नहीं हो पाई हैं। कारगिल युद्ध में शहीद हुए बेंजी-कांडई के सुनील दत्त कांडपाल के गांव के लिए की गई घोषणाएं फाइलों में कैद हो गई हैं। क्यूंजा के भगवान सिंह हो चाहे देवर गांव के गोंविद सिंह के गांव के लोगों को भी जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं।
शहीद के भाई केके कांडपाल बताते हैं जीआईसी कांडई का नाम शहीद के नाम पर रखने की घोषणा हवाई साबित हुई है। विभाग व प्रशासन को कई बार अवगत कराने के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। इधर, जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल आर रवि थापा ने बताया कि वीर सैनिकों के आश्रितों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए नि:शुल्क कंप्यूटर कोर्स व अन्य प्रशिक्षण भी कराए जाते हैं।
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में 2, 1965 व 1971 भारत-पाक युद्ध में 7, ऑपरेशन रक्षक में 13, पवन में 8, पराक्रम में 7, विजय में 3, मेघदूत में 3, कैकटस लिली में 3, रेनू में 1, औलम्पस में 1, बेटल एक्स में 1, ऑरचिट में 1, हिफाजत में 1 सैनिक सहित रुद्रप्रयाग जनपद के 51 वीर सैनिक भारतवर्ष की अखंडता को बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं।
वीर सिंह को मिला कीर्ति चक्र
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में धनपुर पट्टी के पीड़ा गांव के रायफल मैन वीर सिंह को अदम्य साहस के लिए सेना ने 24 सितंबर 1962 को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया। वहीं, वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध में अपने पराक्रम का लोहा मनवाने वाले सारी गांव के हवलदार जय सिंह और बज्यूण गांव के सूबेदार सुजान सिंह को वीर चक्र से नवाजा गया। इसके अलावा 29 जवानों को सेना मेडिल और 6 जवानों को मेन-इन-डिश से नवाजा जा चुका है।