वास्तव में राजा दक्ष ब्रह्मा के इकलौते पुत्र होने के कारण बड़े अभिमानी थे। एक बार जब वे अपने पिता सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के दरबार में पहुंचे तो उनके सम्मान में सभी देव उठ खड़े हुए थे।
भगवान शंकर अनादि देव होने के कारण ब्रह्मा और विष्णु के साथ बैठे रहे। यह दृश्य देखकर दक्ष ने शिव से बैर पाल लिया, जिसे उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया।
बाद में लंबे घटनाक्रम के बाद दक्ष के यज्ञ में उनकी पुत्री सती अपमान की अग्नि में दग्ध हो गई। तब शिव गण वीरभद्र ने क्रुद्ध होकर दक्ष की गर्दन काट दी। देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने उनके कटे धड़ पर बकरे का सिर जोड़कर जीवनदान दिया। पुनर्जीवित हुए दक्ष का सारा अहंकार जाता रहा। उन्होंने सृष्टि के अनादि देव भगवान शिव से वचन लिया कि वे दक्षेश्वर बनकर श्रावण के महीने में हर वर्ष कनखल आएंगे।
दक्ष को दिया वही वचन निभाने के लिए नीलकंठ भगवान सदियों से सावन में कनखल आते हैं। उनके आते ही उनकी ससुराल में रोनक प्रारंभ हो जाती है।
कहीं शंख-घरनावल बजेते हैं तो कहीं भोले-भंडारी के भजन गाए जाते हैं। हरिद्वार में हर-हर महादेव और बम-बम महादेव का जयघोष प्रारंभ हो जाते हैं। कहावत है कि श्रावण मास में हर कंकर शंकर में बदल जाता है।
इसी नगरी से इसी श्रावण में भगवान परशुराम जलाभिषेक के लिए पाषाण लेकर गए थे। करोड़ों शिव भक्त इस पूरे महीने कनखल के साथ-साथ देश के शिवालयों में जलाभिषेक करेंगे। कांवड़ यात्रा के साथ अनेक धर्मयात्राएं पूरे देश में शुरु हो गई हैं।