आज अपना उत्तराखंड तरुणाई के सबसे अहम सोलहवें पायदान पर पहुंच गया है। भाव की दृष्टि से देखें तो यह केदार और बद्री का स्थान है। दोनों दाता। गंगा-यमुना जिसके जल से न जाने कितने तर जाते हैं। फिर हमारे मन में इतना संशय क्यों?
कल तक इसके गठन के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर तमाम लोग आज इसका नाम लेते ही क्यों नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं? पलायन की समस्या, बिजली-पानी, स्वास्थ्य-शिक्षा न जाने क्या-क्या अंतहीन समस्याओं का आरोप। आखिर कौन है, इसका जिम्मेदार? क्या उत्तराखंड ऐसा ही था? बिल्कुल नहीं। इसे हम सबने, आती-जाती सरकारों ने जख्म दिए हैं। सबने अपने-अपने फायदे के हिसाब से बस दोहन किया है।