पंडित जवाहरलाल नेहरु को देहरादून मसूरी समेत उत्तराखंड से बेइंतहा मुहब्बत थी। उनका देहरादून से गहरा संबंध रहा। किशोरावस्था से ही वह देहरादून और मसूरी आते रहे।
आजादी की जंग के दौरान भी वह लगातार देहरादून आए। पुरानी जेल में वह अंतरालों में कई महीनें जेल में कैद रहे। आज जो नेहरु संग्रहालय में है वहां पर पं. नेहरु 1932, 1933, 34 व 1941 में कैद रहे। यहां पर उन्होंने भारत एक खोज पुस्तक के कुछ अंश भी लिखे थे। नेहरु जी राजनीतिक बंदी के तौर पर कैद थे।
उस समय भी देश की राजनीति में उनका बहुत बड़ा कद था। इसलिए जेल में उनके लिए स्नानागार, रसोई, शौचालय व गोदाम अलग से बनाए गए थे। यहां पर उनसे मिलने रोजाना बड़ी तादाद में लोग आते थे। 27 मई 1964 को देश के जवाहर इस संसार को छोड़कर चले गए। मृत्यु से एक दिन पहले वह सहस्त्रधारा गए। वहां पर स्नान किया और भोजन भी किया।
आज जो लोक निर्माण विभाग का अतिथि गृह है वहीं पर उन्होंने भोजन किया। इसके साथ ही कुछ समय तक विश्राम भी किया। सरकार ने इस अतिथि गृह को नेहरु से जोड़ा ही नहीं है। इस बारे में कोई सूचना पट भी नहीं है। यात्रियों को पता ही नहीं चलता कि इस जगह का पंडित नेहरु से कोई नाता भी है या नहीं। इसको स्मृति भवन मनाने की मांग वरिष्ठ कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना करते रहे हैं।
पं. जवाहर लाल नेहरु की भांजी व लेखिका नयनतारा सहगल देहरादून के राजपुर क्षेत्र में रहती हैं। विजय लक्ष्मी पंडित की पुत्री नयनतारा वह नेहरुवाद यानि इस महानायक के विचारों से बेहद प्रभावित हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण वह पं. नेहरु पर कई पुस्तकें लिख चुकी है। यहां पर वह देहरादून के पुराने स्वरूप को बचाने के लिए प्रयासरत रहती हैं। नयनतारा सहगल अभी भी नेहरु पर शोध करती हैं।