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उत्तराखंड विस सदन में कहीं गरिमा गिरी तो कहीं टूटी परंपरा

Tue, 15 Nov 2016 10:31 AM IST
राकेश खंडूड़ी / अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड राज्य की अवधारणा के प्रतीक गैरसैंण में 17 नवंबर से विधानसभा का सत्र होने जा रहा है। मौजूदा विधानसभा का यह आखिरी सत्र है। इस सत्र के समापन के साथ ही उत्तराखंड विधानसभा के सदन की कार्यवाही का भी समापन हो जाएगा।
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राज्य की इस तीसरी निर्वाचित विधानसभा का कार्यकाल उसके अब तक के संसदीय इतिहास में पहली बार घटी उन घटनाओं के लिये याद किया जाएगा, जिनके कारण यह पर्वतीय राज्य सुर्खियों में रहा। संसदीय गरिमा और परंपराओं के टूटने से माननीय आलोचनाओं के निशाने पर रहे।

गोविंद सिंह कुंजवाल को स्पीकर बनाए जाने से लेकर सदन में वित्त विनियोग विधेयक के गिरने-गिराने की जंग तक, सदन ऐसी घटनाओं का गवाह रहा है, जो पहले कभी नहीं घटी। पहली बार गैरसैंण में विधानसभा सत्र के आयोजन से पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होने का सपना देखने वालों को उम्मीद जागी है।
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शुरुआत स्पीकर के चुनाव से हुई। पहली बार स्पीकर मतदान से चुने गए। कुंजवाल अध्यक्ष बनें। सदन 16 जून 2013 में आई भीषण दैवीय आपदा के मुद्दे से गरमाया। राज्य के संसदीय इतिहास में पहली बार प्रश्नकाल रोककर आपदा पर चर्चा कराई गई। पहली बार सदन के सारे काम रोककर आपदा पर नियम 310 के तहत सदन ने पूरे एक दिन चर्चा की। ऐसा पहली बार हुआ जब महाधिवक्ता ट्रैजरी बैंच में जा बैठे। ये राज्य तब भी सुर्खी बना जब इस छोटे से राज्य की विस को देश के सबसे बड़े मुखिया राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संबोधित किया।

मगर उत्तराखंड विधानसभा के संसदीय इतिहास की सबसे स्तब्धकारी घटना तब सामने आई जब विनियोग विधेयक के खिलाफ सत्ता पक्ष के नौ विधायकों ने बगावत कर दी। इसके बाद घटनाओं का जो सिलसिला शुरू हुआ, उन्हें विस ने अपने कार्यकाल में पहली बार भोगा। मसलन, पहली बार हुआ कि स्पीकर के फैसले को अदालत में चुनौती दी गई। पहली बार स्पीकर ने सदस्यों को अयोग्य घोषित किया। पहली बार कोर्ट के निर्देश पर फ्लोर टेस्ट हुआ।

स्पीकर, सभी सदस्यों और स्टॉफ को विधानसभा पैदल जाना पड़ा। गत 21 जुलाई को जब विस बैठी थी, पहली बार सदन में 70 में से 58 विधायक ही मौजूद थे। इन घटनाओं से जुदा राज्य गठन के बाद पहली बार गैरसैंण में विस का विशेष सत्र हुआ। तीसरी बार सरकार गैरसैंण में सत्र करने जा रही है और सबकी जुबां पर यह सवाल है कि राज्य आंदोलनकारियों की भावना के प्रतीक गैरसैंण में ऐसा क्या होगा, जो अब तक नहीं हुआ।
 
‘प्रतिपक्ष ने स्पीकर के चयन की परंपरा को तोड़ा। मैं चुनाव के बाद अध्यक्ष बना, जबकि पहले आम सहमति की परंपरा थी। नेता प्रतिपक्ष ने दो बातें कहीं थी। मेरी निष्पक्षता पर उन्होंने कहा था कि मैं 70 सीटों में से कहीं से भी चुनाव लडू़ंगा, जीतूंगा। 18 मार्च के बाद उन्हीं नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जब तक मैं कुर्सी पर रहूंगा, विपक्ष सदन में नहीं आएगा।’
- गोविंद सिंह कुंजवाल, स्पीकर

‘पांच सालों में सदन के भीतर संसदीय परंपराएं टूटी। लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट आई। जिस विधायिका का काम कार्यपालिका पर नियंत्रण करना था, वो नाकाम रही। सदन के भीतर घटी घटनाएं उचित संकेत नहीं हैं।
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- प्रकाश पंत, पूर्व स्पीकर
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