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उत्तराखंड: यहां रावण दहन नहीं, पश्चाताप के लिए होता है गागली युद्ध, सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम

Mon, 19 Oct 2026 12:48 PM IST
Renu Saklani सुपा सिंह बिष्ट, संवाद न्यूज एजेंसी, साहिया

सार

देशभर में दशहरे पर रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड के जौनसार-बावर में इसकी परंपरा अलग है। उद्पाल्टा और कुरोली गांवों में रावण दहन के बजाय गागली युद्ध के जरिए सदियों पुरानी पश्चाताप की परंपरा निभाई जाती है। इसमें ग्रामीण अरबी के तनों और घास के गोलों से सांकेतिक युद्ध करते हैं।
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आपस में युद्ध करते उद्पाल्टा व कुरोली के ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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देशभर में विजयादशमी पर जहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, वहीं जौनसार-बावर के उद्पाल्टा और कुरोली गांव में इस पर्व को मनाने की परंपरा बिल्कुल जुदा है। यहां रावण दहन के बजाय सदियों पुरानी पश्चाताप की परंपरा निभाई जाती है।

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इस दिन दोनों गांवों के ग्रामीणों के बीच एक अनोखा युद्ध होता है, जो अब हिंसा के बजाय अरबी के तनों (गागली) और घास के गोलों से सांकेतिक रूप में लड़ा जाता है।इस अनूठी परंपरा का संबंध सदियों पहले घटी एक दुखद घटना से है। ग्रामीणों के अनुसार, उद्पाल्टा गांव के एक परिवार में रानी और मुन्नी नाम की दो चचेरी बहनें थीं। एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। इस हादसे के लिए मुन्नी को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे ताने दिए गए।

 घास, दूब और फूलों से सजाकर इन प्रतिमाओं की पूजा
तानों से आहत होकर मुन्नी ने भी उसी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। दोनों बहनों की मौत के पश्चाताप स्वरूप ही यह अनुष्ठान और युद्ध की परंपरा शुरू हुई, जिसका दोनों गांवों के लोग पीढ़ियों से निर्वहन कर रहे हैं। परंपरा के तहत दुर्गा अष्टमी से ही दोनों बहनों की प्रतीकात्मक प्रतिमाएं बनाने का काम शुरू हो जाता है। घास, दूब और फूलों से सजाकर इन प्रतिमाओं की पूजा की जाती है और दशहरे के दिन इन्हें गांव के समीप उसी कुएं में विसर्जित किया जाता है।
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इसी दिन उद्पाल्टा और कुरोली के ग्रामीणों के बीच युद्ध की रस्म अदायगी होती है। किसी दौर में यह युद्ध लाठी-डंडों और पत्थरों से होता था, लेकिन अब ग्रामीण अरबी के तनों और घास-फूस के गोलों को एक-दूसरे पर फेंककर यह गागली युद्ध करते हैं। इसे देखने के लिए आसपास के गांवों से भारी भीड़ उमड़ती है। युद्ध के बाद सभी लोग उद्पाल्टा के पंचायती आंगन में जुटते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ नाच-गाने का उत्सव मनाते हैं।

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