भ्रष्टाचार पर चोट करने में शायद उत्तराखंड सरकार की दिलचस्पी नहीं है। यूपी में लोकायुक्त ने 22 मंत्रियों की कुर्सी छीन ली और दो विधायकों की सदस्यता निरस्त करवाकर पैदल कर दिया। लेकिन उत्तराखंड में पिछले पंद्रह महीने से लोकायुक्त की कुर्सी खाली पड़ी है।
समयबद्ध तरीकेसे लोकायुक्त की नियुक्ति ना करनी पड़े इसलिए सरकार ने पिछले सत्र में संशोधन लाकर छह महीने की बाध्यता समाप्त कर दी। लोकायुक्त की नियुक्ति अब कब तक हो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। 23 अक्टूबर 2013 को लोकायुक्त के पद पर जस्टिस एमएम घिल्डियाल का समय समाप्त हो गया, उसकेबाद से अब तक यह पद रिक्त है।
लोक सेवा आयोग से चयनित और समूग ग घ की श्रेणी के लगभग 35 अधिकारी कर्मचारियों की पगार, भवन किराया आदि मद में हर महीने 6-7 लाख रुपए खर्च होते लेकिन इस समय कोई काम लोकायुक्त दफ्तर में नहीं है। लोकायुक्त नहीं होने से ना तो शिकायतें आ रही है और ना ही पुराने दर्जनों मामलों की सुनवाई हो रही है।
मगर राज्य की हरीश सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है। लोकायुक्त कितना जरूरी है, इसका उदाहरण यूपी में देखा जा सकता है। 22 मंत्री, दो विधायकों की कुर्सी गई, यूपीआरएनएन के सैकड़ों कनिष्ठ अभियंता जांच झेल रहे है।