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उत्तराखंड सरकार को भ्रष्टाचार से है लगाव!

Mon, 02 Feb 2015 03:33 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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भ्रष्टाचार पर चोट करने में शायद उत्तराखंड सरकार की दिलचस्पी नहीं है। यूपी में लोकायुक्त ने 22 मंत्रियों की कुर्सी छीन ली और दो विधायकों की सदस्यता निरस्त करवाकर पैदल कर दिया। लेकिन उत्तराखंड में पिछले पंद्रह महीने से लोकायुक्त की कुर्सी खाली पड़ी है।
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समयबद्ध तरीकेसे लोकायुक्त की नियुक्ति ना करनी पड़े इसलिए सरकार ने पिछले सत्र में संशोधन लाकर छह महीने की बाध्यता समाप्त कर दी। लोकायुक्त की नियुक्ति अब कब तक हो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। 23 अक्टूबर 2013 को लोकायुक्त के पद पर जस्टिस एमएम घिल्डियाल का समय समाप्त हो गया, उसकेबाद से अब तक यह पद रिक्त है।

लोक सेवा आयोग से चयनित और समूग ग घ की श्रेणी के लगभग 35 अधिकारी कर्मचारियों की पगार, भवन किराया आदि मद में हर महीने 6-7 लाख रुपए खर्च होते लेकिन इस समय कोई काम लोकायुक्त दफ्तर में नहीं है। लोकायुक्त नहीं होने से ना तो शिकायतें आ रही है और ना ही पुराने दर्जनों मामलों की सुनवाई हो रही है।
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मगर राज्य की हरीश सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है। लोकायुक्त कितना जरूरी है, इसका उदाहरण यूपी में देखा जा सकता है। 22 मंत्री, दो विधायकों की कुर्सी गई, यूपीआरएनएन के सैकड़ों कनिष्ठ अभियंता जांच झेल रहे है।
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ये है राज्य के लोकायुक्त की दास्तां

बीसी खंडूड़ी ने अक्टूबर 2011 में लोकायुक्त एक्ट पास किया, तीन सितम्बर 2013 को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी और 09 सितम्बर को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य को सूचित किया। इसके बाद विधायी विभाग ने इसे 24 सितम्बर 2013 को प्रकाशन के लिए भेजा। लेकिन सरकार को भनक लगी तो प्रकाशन रुकवाया गया।

लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि नया कानून लाया जाएगा। इसके बाद 17 नवम्बर 2013 को तत्कालीन सीएम विजय बहुगुणा ने मंथन करने के लिए सत्तारूढ़ दल के 38 विधायकों की बैठक बुलाई जिसमें सहयोगी दलों के तीन मंत्रियों समेत 16 विधायक नहीं आए।

खास बात यह थी कि इस बैठक में हरीश गुट का कोई विधायक नहीं था। लेकिन सरकार ने विधानसभा सत्र में खंडूड़ी का लोकायुक्त निरस्त कराकर अपना लोकपाल बिल पास करा लिया जिसे राज्यपाल ने 26 फरवरी 2014 को मंजूरी दे दी।

मगर, तब से अब तक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया और लोकायुक्त की कुर्सी 23 अक्टूबर 2013 से रिक्त चल रही है। एक्ट में लोकायुक्त को नियुक्त करने के लिए छह महीने का समय था, लेकिन सरकार ने उसमें संशोधन कराकर यह बाध्यता भी समाप्त कर दी।
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