स्वामी हंसदेवाचार्य का जन्म हरियाणा में झज्झर जिले के दुजाना गांव में हुआ था। हंसदेवाचार्य जब तक रामानंदाचार्य पद पर आसीन नहीं हुए थे, जब तक हरिद्वार में उन्हें स्वामी हंसदास के नाम से जाना जाता था। बालपन में ही वे हरिद्वार चले आए और चेतन ज्योति विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। हरिद्वार में नगर पालिका अध्यक्ष रहे सतपाल ब्रह्मचारी उनके बाल सहपाठी हैं।
स्वामी हंसदास ने अनेक गुरु धारण किए। वे ऋषिकेश के स्वामी जगन्नाथ के शिष्य बने। बाद में जगन्नाथ धाम के नाम से उन्होंने कई आश्रम बनाए। स्वामी हरिदास से उन्होंने मंत्र दीक्षा ली थी। स्वामी पूर्णनाथ और कृष्णानंद भी उनके गुरु थे। स्वामी हंसदास पहले उदासियों के बड़े अखाड़े से जुड़े और उस अखाड़े के महामंडलेश्वर बने। बाद में वैष्णव संप्रदाय अपनाकर स्वामी हंसदास बैरागी अणियों से जुड़ गए।
उनका नाम हंसदेवाचार्य हो गया। वैष्णव संप्रदाय ने वर्ष 2010 के हरिद्वार कुंभ में उन्हें अपना सर्वोच्च पद जगद्गुरु रामानंदाचार्य प्रदान किया। स्वामी हंसदेवाचार्य की संघ परिवार में गहरी पैठ थी। देश की जानी-मानी राजनीतिक हस्तियां उनसे आशीर्वाद लेने हरिद्वार आती थीं। राम जन्मभूमि के आंदोलन में स्वामी हंसदेवाचार्य का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। हाल ही में उन्होंने प्रयागराज में हुई विहिप की धर्म संसद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज के निधन से संत समाज में शोक की लहर दौड़ गई। निधन की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में संत उनके आश्रम जगन्नाथ धाम पहुंचे और उनको श्रद्धांजलि दी। संतों ने हंसदेवाचार्य के निधन को धर्म जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया।
जयराम आश्रम के परमाध्यक्ष स्वामी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी महाराज ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज हिंदुओं के हृदय सम्राट और संत समाज के प्रेरणास्रोत थे। बाबा हठयोगी ने कहा कि स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज जीवन पर्यंत राष्ट्र और समाज की सेवा करते रहे।
राम मंदिर निर्माण के लिए वह हमेशा सक्रिय रहे। निर्धन निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी ऋषि रामकृष्ण महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज आध्यात्मिक जगत के शिखर महापुरुष थे। उन्होंने अपने तप और विद्वता के माध्यम से समाज का मार्ग दर्शन किया।
श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन के कोठारी महंत प्रेमदास महाराज, श्री पंचायती अखाड़ा निर्मला के मुखिया महंत कमलजीत, कोठारी महंत जसविंद्र सिंह, सचिव महंत बलवंत सिंह ने भी उनके निधन पर शोक जताया।
श्री दक्षिण काली पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद ब्रह्मचारी महाराज ने कहा कि राम मंदिर के लिए उनका संघर्ष इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। इसके अलावा महामंडलेश्वर स्वामी कपिल मुनि, महामंडलेश्वर स्वामी रामेश्वरानंद सरस्वती महाराज, सतपाल ब्रह्मचारी, महामंडलेश्वर स्वामी श्याम सुंदरदास शास्त्री, महंत रामकिशनदास महाराज, महंत विनोद गिरी महाराज आदि ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि महाराज, आनंद पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर, स्वामी बालकानंद गिरि महाराज ने कहा कि प्रयागराज कुंभ मेले में स्वामी हंसदेवाचार्य महाराज ने सभी संत महापुरुषों को एक मंच पर लाने का जो कार्य किया है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
संत समाज को एकजुट करने में उनकी अहम भूमिका रहती थी। उन्होंने सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर एक नए रूप में प्रस्तुत किया। अपनी तप और विद्वता के माध्यम से उन्होंने समाज से कुरीतियों को मिटाकर सदैव एक नई दिशा प्रदान की।