डॉ. किरन ने कहा कि महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका रही हैं। उत्तराखंड में ज्यादातर महिलाएं खेती और पशुपालन से जुड़ी हैं। परंपरागत तरीके से होने वाले खेती और पशुपालन व्यवसाय जीवन यापन के लिए पर्याप्त नहीं है। जंगल, खेती, पशुपालन, पानी को वैज्ञानिक तरीके से जोड़कर कैसे इससे आय बढ़ाई जाए इस पर काम करने की जरूरत है। उत्तराखंड में संसाधन बहुत हैं। अगर उन पर कार्य करेंगे तो महिलाओं की आजीविका बहुत बढ़ सकती है। डॉ. किरन ने चमोली के पाखी गांव के महिला मंगल दल का उदाहरण दिया। वहां पर माल्टा बहुत मात्रा में होता था। पर्याप्त मूल्य न मिलने के कारण माल्टा सड़ जाता था।
दल की प्रधान विश्वेश्वरी देवी ने 1990 में वहां पर फल संरक्षण इकाई लगाई। इससे माल्टा से विभिन्न उत्पाद बनाकर कई महिलाओं को रोजगार से जोड़ा। अब कई महिला मंगल दल पहाड़ों में बहुत सारे स्थानीय उत्पाद बनाते हैं और देहरादून आदि शहरों में लगने वाले मेलों में उन्हें बेचते हैं। सरकार को भी स्थानीय संसाधनों व उत्पादों के जरिये महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ठोस नीति बनाकर इस तरह की चीजों को बढ़ावा देना चाहिए। डॉ. किरन ने कहा कि उत्तराखंड राज्य को बनाने, पर्यावरण बचाने जैसे आंदोलन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका रही है। चिपको आंदोलन जैसे आंदोलन इसी धरती से उपजे हैं। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर भी बात होनी चाहिए। भूमिधरी अधिकार दिए जाने से महिलाओं को निश्चित तौर पर इसका फायदा मिलेगा।
सिर्फ कानून बनाने से काम नहीं चलेगा, जागरूकता भी जरूरी : मनीषा डुसेजा
युवा अधिवक्ता मनीषा डुसेजा ने कहा कि कई घरों में बेटियों को पता ही नहीं होता कि उनके अधिकार क्या हैं। इसलिए महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा और उत्थान के लिए कानून बनाने से ही काम नहीं चलने वाला है। इसके लिए उन्हें जागरूक भी करना होगा। आज भी समाज में बेटों की चाहत रखने वाले लोग बहुत हैं। कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित वर्ग से आने वाले लोग भी इस तरह की सोच रखते हैं।
इस सोच को बदलने की जरूरत है। अधिवक्ता मनीषा ने कहा कि उत्तराखंड में महिलाओं को भूमिधरी अधिकार दिए जाने के राज्य सरकार के फैसले का निश्चित तौर पर महिलाओं को फायदा मिलेगा। बशर्ते महिलाओं को इस बारे में अधिक से अधिक जागरूक करते हुए सटीक कानूनी और सामाजिक पहलुओं की जानकारी दी जाए। जिनके बेटा-बेटी हैं, उसमें भी महिलाओं को भूमिधरी अधिकार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि महिलाओं का अधिकार है। वह अपने हिस्से की जमीन व संपत्ति को दान भी कर सकती हैं।
डेयरी उद्योग चलाने वाली उद्यमी विद्या सृष्टि काला ने कहा कि समाज में धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है। महिलाओं के विकास के मामले में भी यह हो रहा है। समाज में यह एक अच्छी पहल है। अगर शहरों की बात करें तो आमतौर पर जितना लोग बेटों को पढ़ाते लिखाते हैं, उतना ही बेटी को भी पढ़ा रहे हैं। गांवों के मामले में अब भी मुश्किलें हैं। वहां दूसरी तरह की दुश्वारियां हैं। हर माता पिता चाहते हैं कि वह अपनी बेटियों को भी बेटों की तरह पढ़ाएं, लेकिन चाहकर भी वह ऐसा नहीं कर पाते।
गांवों में स्कूल कॉलेज दूर होने, महिला सुरक्षा का भय, कच्चे रास्ते और कम उम्र में घर की जिम्मेदारी संभालने के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में बेटियों को अब भी पढ़ाई के मामले में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसलिए सरकारों को चाहिए कि महिलाओं का विकास करना है तो इस दिशा में भी ठोस नीति बनानी होगी। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में सरकारों से ज्यादा महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में बड़ा योगदान दिया है। चाहे वह वनों को बचाने का मामला हो या किसी अन्य तरह के रचनात्मक आंदोलनों का मुद्दा। उन्होंने कहा कि अगर उपेक्षा होती रही तो आज की नारी अपना हक छीनना भी जानती है। इस बात का ख्याल समाज के साथ ही सरकारों को रखना होगा।
खानपान तक में किया जाता है भेदभाव : श्वेता अग्रवाल
डेयरी उद्योग चालने वाली एक अन्य डेरी उद्यमी श्वेता अग्रवाल ने बताया कि बेटियों से पढ़ाई और महत्वपूर्ण फैसले लेने में ही नहीं, बल्कि कई बार खानपान में भी भेदभाव किया जाता है। यहां तक कि पढ़े-लिखे लोग भी बेटे की चाह रखते हैं। सरकार की योजनाएं तो बहुत हैं, लेकिन सुदूर क्षेत्रों में उनके बारे में जानकारी पहुंचाना बहुत मुश्किल लगता है। जंगल में महिलाएं घास के लिए जाती हैं। जहां उन्हें जंगली जानवरों से जान का खतरा रहता है। सरकार ने जानवरों के लिए घास के बदले बहुत कम दाम पर पशु चारा उपलब्ध कराने की जो घोषणा की है, वह सही निर्णय है। हालांकि यहां भी यह बात ध्यान रखने वाली होगी कि असल किसानों और महिलाओं तक इन योजनाओं का लाभ पहुंच सके। डेरी फार्म में हम ज्यादा से ज्यादा गांव की महिलाओं को जोड़ रहे हैं। गाय लेने पर सरकार 50 प्रतिशत सब्सिडी भी दे रही है। महिलाओं को हिम्मत से काम करना होगा। इसमें परिवार वालों और एक-दूसरे का सहयोग भी जरूरी है। ड्रग्स और शराब पहाड़ की महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या है। नशा युवाओं के साथ पूरे परिवार को बर्बाद कर रहा है। जिससे सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं को झेलनी पड़ती है। सरकार को इसे लेकर जागरूकता फैलानी होगी। स्वस्थ्य नारी ही सशक्त समाज को बना सकती है।
महिलाओं के मुद्दों से जुड़ी पत्रिका प्रकाशित करने वाली शीला रजवार ने कहा कि शराब पहाड़ की महिलाओं की बहुत बड़ी समस्या है। उत्तरा पत्रिका ने इसे लेकर महिलाओं की पीड़ा को कई अंकों में समाज और सरकारों के सामने रखा है। मुख्यमंत्री के नाम खुला पत्र भी पत्रिका में प्रकाशित किया। जब उत्तराखंड आंदोलन चल रहा था, तब भी महिलाओं का बड़ा मुद्दा शराबबंदी का था। दूसरी चीज भूमि पर सहभागीदारी सही ढंग क्रियान्वयन होती है तो बहुत बढ़िया होगा। महिला को भी किसान का दर्जा मिलेगा। महिलाओं को स्वरोजगार के लिए बैंकों से ऋण मिलने में भी आसानी होगी।
शीला का कहना है कि जब तक मानसिकता नहीं बदलती तब तक कानून बनाने से ही सब कुछ नहीं बदल जाएगा। घर के बाहर बेटी के नाम की पट्टी लगाने से तात्कालिक कुछ फायदा नहीं होगा। अब भी बहुत सारी चीजों में महिलाओं को ‘तुम नहीं समझोगी’ की प्रवृत्ति बदली नहीं है। कोई कानून अगर बनता है तो इसके लिए पहले समाज में चेतना आना भी एक कारण होता है। समाज के किसी ने किसी वर्ग को इसकी शुरूआत करनी चाहिए। कानून बनाने के साथ ही मानसिकता में भी बदलाव जरूरी है, तभी अधिक से अधिक महिलाओं का उत्थान हो सकेगा। लव जेहाद पर कानून बनाना भी स्त्री की सोच पर पहरा लगाने की तरह है। इससे यह साबित होता है कि आप ने मान लिया कि लड़कियां इतनी योग्य नहीं जो अपने बारे में सोच सकें।
योजनाओं के प्रचार को दिए सुझाव
युवा अधिवक्ता मनीषा डुसेजा ने सलाह दी कि हमारा समाज आज भी कई बदलावों को स्वीकार नहीं करता है, वरना कानून और घर के बाहर बेटी के नाम की प्लेट लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने कहा कि अमर उजाला माई सिटी संस्करण में जैसे जॉब की जानकारी देने वाला लोकप्रिय कॉलम आता है। वैसा ही योजनाओं की जानकारी का भी एक कॉलम हो। वहीं, डेयरी उद्योग से जुड़ी उद्यमी श्वेता अग्रवाल ने कहा कि योजनाओं की जानकारी को जन-जन तक पहुंचाने वाला अमर उजाला लेखों के माध्यम से महिलाओं के लिए बनने वाले कानूनों से भी लोगों को अपडेट करते रहे। इस पर अमर उजाला देहरादून के राज्य संपादक संजय अभिज्ञान न सुझावों पर अमल करने के लिए महिला अतिथियों को आश्वस्त किया।
सिर्फ औपचारिकता के लिए न मनाया जाए कोई भी दिवस
राज्य संपादक संजय अभिज्ञान ने वेबीनार का संचालन करते हुए महिला उत्थान और सरकार की नीतियों पर समाज व मीडिया के योगदान के विभिन्न पहलू सामने रखे। उन्होंने कहा कि महिला दिवस सिर्फ औपचारिकता या दस्तूर के लिए नहीं मनाया जाना चाहिए। इस तरह के विचार-विमर्श से नीतियों और कमियों की तरफ समाज और सरकारों का ध्यान दिलाया जा सकता है।