मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना (एमएसबीवाई) की धीमी चाल पर राजभवन ने पत्रावलियां तलब की हैं। योजना के तहत मरीजों को मिलने वाले निशुल्क इलाज का दायरा न बढ़ पाने पर भी राजभवन ने जवाब मांगा है।
गरीबों और कम आय वर्ग (जो सरकारी नौकरी में न हो) के लोगों के लिए अप्रैल 2015 में इस योजना की शुरूआत की गई थी। योजना के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक परिवार को सभी सरकारी और पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में साल भर में 50 हजार रुपये तक के निशुल्क की सुविधा थी।
सरकार का अक्तूबर 2015 से निशुल्क इलाज की धनराशि 1.75 लाख रुपये करने का प्रस्ताव था। इस तिथि तक यह अमल में नहीं आ पाया। फिर इसकी तिथि आगे बढ़ती रही। बाद में दो बार इंश्योरेंस कंपनियों के टेंडर भी कॉल किए गए, लेकिन रेट पर बात नहीं बन पाई।
खास कंपनी को लाभ पहुंचाने का था आरोप
तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाकर वित्त विभाग से पूछा था कि अगर कोई आपत्ति है तो बताएं। साथ ही इसे जल्द से जल्द लागू करने के निर्देश दिए। सूत्रों का कहना है कि किसी खास प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनी को लाभ पहुंचाने की वजह से इसमें देरी हो रही है।
इस बीच, बकाया भुगतान न होने पर कई निजी अस्पतालों ने निशुल्क इलाज की सुविधा देनी बंद कर दी। पूर्व में भी बकाया बिल न मिलने पर निजी अस्पताल बीच-बीच में यह सुविधा रोकते आए हैं।
राजभवन ने पत्रावालियां तलब कर किस कंपनी को कब-कब कितना भुगतान हुआ, कितने लोगों को योजना का लाभ मिला समेत विभिन्न बिंदुओ पर जवाब तलब किया है। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ओमप्रकाश ने बताया कि राजभवन को पत्रावलियां उपलब्ध करा दी गई हैं। राजभवन के निर्देश पर अगली कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।