भगवा ब्रिगेड अपनों की ही गुटबाजी में फंस गई है। उत्तराखंड भाजपा में सपोर्ट करने वाले विधायक कम और पर्दे के पीछे विरोधियों की संख्या ज्यादा हो गई।
उत्तराखंड में भगवा ब्रिगेड की लड़ाई ऐसी सतह पर आई कि नेता प्रतिपक्ष के मामले में पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष को लेकर कोई निर्णय लेने से परहेज करते हुए वर्तमान व्यवस्था को ही लागू रखा। कई दावेदार थे, लेकिन पार्टी हाईकमान निर्णय नहीं ले सका। पार्टी विधानमंडल दल में अलग-अलग गुटों के बीच खिंची तलवारें इसकी मुख्य वजह बताई जा रही हैं।
कुल मिलाकर इस गुटबाजी का फायदा अजय भट्ट को मिलेगा, वह अगली व्यवस्था तक नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे। वैसे भी मौजूदा सरकार का यह आखिरी बजट सत्र है, इसलिए इसके बाद यदि नेता प्रतिपक्ष बनता भी है तो अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने के सीमित मौके रहेंगे।
31 दिसंबर को अजय भट्ट जब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने तो नए नेता प्रतिपक्ष की जोरों से तलाश शुरू हो गई। खास बात यह है कि इसके लिए तेजी से शुरू हुई तलाश पार्टी के भीतर बने स्पीड ब्रेकर्स के बीच हिचकोले लेती रही। हालात इतने बदतर होने लगे कि दावेदारों के साथ सपोर्ट करने वाले विधायक कम और पर्दे के पीछे विरोधियों की संख्या ज्यादा हो गई।
पार्टी के भीतर निर्णय लेने की क्षमता का अभाव
अजय भट्ट
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पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता इस बात से भी आहत हुआ कि बड़े नेताओं की जो भूमिका प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए हुए झगड़े में रही, उसी तरह की बिसात नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर भी बिछाई गई।
नतीजतन, पार्टी विधानमंडल दल में कई मजबूत और तजुर्बेकार विधायक होने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी किसी को नहीं दिया जाना यह बात साबित करता है कि दिल्ली से लेकर देहरादून तक पार्टी के भीतर निर्णय लेने की क्षमता का अभाव पैदा हो गया है।
पार्टी हाईकमान किसी भी निर्णय से पहले अपने ही नेताओं द्वारा दिखाए जाने वाले कथित विरोध के डर से सशंकित हो उठता है। हालांकि अजय भट्ट ने कहा कि किसी तरह की गुटबाजी नहीं है, पार्टी का निर्णय सभी को मान्य है। इस पद के सबसे मजबूत दावेदार मदन कौशिक ने भी यही कहा कि पार्टी का निर्णय मानना ही होता है, और हर निर्णय के पीछे कोई ना कोई अच्छाई छिपी होती है।