फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रुड़की: खतरे से एक घंटे पहले मिलेगा अलर्ट, चमोली में ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए स्वदेशी तकनीक तैयार

Sat, 12 Sep 2026 01:07 PM IST
Renu Saklani संवाद न्यूज एजेंसी, रुड़की।

सार

ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरों की निगरानी के लिए उत्तराखंड में तकनीक का दायरा बढ़ाया जा रहा है। चमोली के वसुंधरा ताल में लगने वाला नया सिस्टम खतरे की आशंका होने पर समय रहते अलर्ट देने में मदद करेगा।
विज्ञापन
सीबीआरआई की ओर से ढोंडी मनाली में लगाया गया सेंसर युक्त टॉवर, यही प्रणाली वसुंधरा ताल में स्थापित की - फोटो : सीबीआरआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की चमोली जिले के वसुंधरा ताल में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करेगा। इसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इससे पहले सीबीआरआई द्वारा विकसित इस स्वदेशी तकनीक को मनाली में स्थापित किया गया था, जहां से पिछले करीब एक वर्ष से लगातार डेटा प्राप्त हो रहा है। अब इसी तकनीक को वसुंधरा ताल में लगाया जाएगा।

विज्ञापन


वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में यह प्रणाली करीब एक घंटे पहले अलर्ट जारी करने में सक्षम होगी। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद हिमनद झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार और सीबीआरआई मिलकर ग्लोफ मॉनिटरिंग एंड अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित कर रहे हैं।

सीबीआरआई के निदेशक प्रो. आर प्रदीप कुमार ने बताया कि इसके तहत झील क्षेत्र में एक विशेष टॉवर लगाया जाएगा, जिसमें कई आधुनिक सेंसर स्थापित होंगे। ये सेंसर बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करेंगे।

सेंसर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज देंगे

विज्ञापन

प्रणाली झील से संबंधित प्राकृतिक परिवर्तनों और संभावित आपदाओं का डेटा एवं तस्वीरें रीयल टाइम में निगरानी केंद्र तक भेजेगी। किसी भी असामान्य गतिविधि, जैसे हिमखंड का झील में गिरना, जलस्तर का अचानक बढ़ना या झील के प्राकृतिक बांध में दरार आने की स्थिति में सेंसर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज देंगे।

सेंसर सेटेलाइट से जुड़े होंगे और घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी कारण वसुंधरा ताल टूटता है तो पानी और मलबा करीब 20 किलोमीटर नीचे तक मात्र आठ से दस मिनट में पहुंच सकता है।

ये भी पढ़ें...हरिद्वार: दिल दहला देनी वाली वारदात, बेटे ने खोया आपा, बेरहमी से पिता के सिर पर किए डंडे से ताबड़तोड़ वार
विज्ञापन


ऐसे में यह अर्ली वार्निंग सिस्टम संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी कर जान-माल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस तकनीक के डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डी.पी. कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।


 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें