लोगों को मुनादी कर बताया कि जो हमसे मिलना चाहता है उसको हम कुछ नहीं कहेंगे। गांव के लोग हथियार डाल दें और जो गांव छोड़कर जाना चाहता हैउसको भी कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन राजा विजय सिंह के नेतृत्व में सेनापति कल्याण सिंह व भूरा उपसेनापति ने युद्ध का मोर्चा संभाल लिया और अंग्रेजों को ललकार कर कहा कि हमें समझौता नहीं, हमें आजादी चाहिए।
गांव छोड़कर हम नहीं जाएंगे बल्कि आपको देश छोड़कर जाना ही होगा। जिस पर आगबबूला होकर अंग्रेजी से सैनिकों ने गांव पर चारों तरफ से घेर कर हमला शुरू करदिया और पूरे गांव को शहीद कर डाला।
जो लोग ज्यादा शक्तिशाली थे, अंग्रेजी सेना ने उनको बांधकर रुड़की के समीप सुनहरा स्थित एक बरगद के पेड़ परफांसी पर लटका दिया था। तभी से 3 अक्टूबर को कुंजा गांव में बलिदान दिवसमनाया जाता है। सरकारी आंकड़ों में भी गांव के 152 लोग शहीद हुए अंकित है। पूर्व ग्राम प्रधान विजय पाल सिंह ने बताया कि लगभग 15 वर्ष पूर्वनीदरलैंड से इतिहास के एक प्रोफेसर जिनका नाम डॉक्टर डीएचए कॉफ था, वह गांवमें आए और तीन-चार दिन तक गांव में ही रुके। उन्होंने गांव का बारीकि से अध्ययन किया।
उन्होंने बताया कि नीदरलैंड की लाइब्रेरी में एक रिकॉर्ड रखा है। जिसमें कुंजा बहादुरपुर से ही अंग्रेजो के खिलाफ सबसे पहली क्रांति का जिक्र है। उसको पढ़कर ही वह गांव में आए हैं, भ्रमण के बाद जब डॉक्टर नीदरलैंड पहुंचे तो उन्होंने नीदरलैंड की लाइब्रेरी का रिकॉर्ड ग्रामीणों को पोस्ट से भिजवाया। जिसको ग्रामीण आज भी संजोए बैठे हैं। वहीं सहारनपुर गजट में भी कुंजा बहादुरपुर से ही पहली क्रांति शुरू होने का जिक्र है।