भारत में इस परियोजना की जिम्मेदारी कई संस्थाएं संभाल रही हैं, जिनमें से यूसैक भी एक है। यूसैक ने सैटेलाइट के माध्यम से भारत के हिस्से में आने वाली सात हजार किलोमीटर कैलाश भूक्षेत्र की जियो मैपिंग पूरी कर ली। इस मैपिंग के तहत 40 नक्शे बनाए गए हैं। इनमें इस क्षेत्र में 1976 से आ रहे बदलाव का शोधपरक अध्ययन किया गया है।
मानचित्रों में हिमालयी इलाके में भू-स्खलन क्षेत्रों की स्थिति, प्रजातिवार वन, प्रमुख पर्यटन और मंदिरों के अलावा कीड़ा जड़ी का वितरण दर्शाया गया है। इन जानकारियों को पुस्तक में संकलित किया गया है। यूसैक के निदेशक डा. एमपीएस बिष्ट ने बताया कि इससे पर्यावरणीय मॉनीटरिंग और योजनाओं के निर्धारण में विशेष सहायता मिलेगी।
क्षेत्र के लोगों में मौसम से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि तीनों देशों में कुल 31 हजार वर्ग किलोमीटर कैलाश भूक्षेत्र है। इसमें से 14 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नेपाल में, 10 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन में और सात हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भारत में है।
भारत में इस योजना में पिथौरागढ़ और बागेश्वर के सीमांत इलाके पर फोकस किया गया है। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत इन देशों के सीमावर्ती इलाकों के बच्चे एक दूसरे देश की संस्कृति और खानपान को समझ रहे हैं। यह इलाका हिंदुओं, सिखों, बौद्धों ,बान आदि लोगों को लिए पवित्र माना गया है।
यह संस्थाएं भी कर रहीं काम
योजना में यूसैक के अलावा गोविंद बल्लभ पंत पर्यावरण संस्थान, भारतीय वन्य जीव संस्थान, उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड, वन विभाग और सरकारी संस्था चिया भी काम कर रही है।