पशुपतिनाथ यानी भोले शंकर की तपस्थली, माता सीता की जन्मस्थली जनकपुरी और भगवान बुद्ध की नगरी लुम्बिनी से भारतीयों का जुड़ाव आदि काल से है। वहीं, गोरखनाथ मंदिर में आज भी गोरखाओं के वंशजों के यहां से पहली खिचड़ी चढ़ाए जाने का रिवाज है।
कहा जाता है कि कालांतर में बाबा गोरखनाथ के अनुयायी ही गोरखा कहलाए। इतिहास साक्षी है कि भारतीय नरेशों और नेपाल नरेशों के बीच वैवाहिक संबंध रहे हैं। मैत्री के कारण ही प्रतिवर्ष बनबसा सीमा से दस से बारह लाख नेपाली नागरिक भारत में रोजगार के लिए आते हैं।
प्रतिवर्ष पांच से दस लाख नेपाली तीर्थयात्री हरिद्वार, गंगोत्री, बद्री-केदार धाम, गया पहुंचते हैं। कुंभ के अवसर पर बनबसा सीमा से करीब पंद्रह से बीस लाख नेपाली श्रद्धालु हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक तक हो आते हैं। चीन के साथ किसी भी रूप में नेपाल के भारत के समान गहरे संबंध नही हो सकते हैं।
इस पर नेपाल के नागरिकों को सोचना होगा। सीमा विवाद मामले पर तो दोनों सरकारों को आपसी बातचीत और सर्वेक्षण विभागों के जरिये समाधान किया जा सकता है, लेकिन खानपान, आचार व्यवहार, मंदिरों की आस्था, गंगा नदी की धारा आदि के लिए नेपाल को भारत ही आना होगा।